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पिता के इन फैसलों को पलटकर मशहूर हुए जस्टिस चंद्रचूड़, अब बनेंगे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस

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नई दिल्ली

जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ देश के 50वें प्रधान न्यायाधीश (CJI) बनने जा रहे हैं। मौजूदा सीजीएआई जस्टिस उदय उमेश ललित ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में उनके नाम की सिफारिश केंद्र सरकार को भेज दी है। बड़ी बात यह है कि जस्टिस डीवी चंद्रचूड़ के पिता जस्टिस यशवंत विष्ण चंद्रचूड़ भारत केप्रधान न्यायाधीश रह चुके हैं। 22 फरवरी, 1978 से 11 जुलाई, 1985 तक, सुप्रीम कोर्ट के 16वें सीजेआई के तौर पर उनका कार्यकाल सबसे लंबा रहा है। अब 37 साल बाद उनके पुत्र जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सीजेआई बनने वाले हैं जो दो वर्षों तक इस पद पर रहेंगे। दिलचस्प बात है कि जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ अपने पिता के ही कई महत्वपूर्ण फैसलों को पलट चुके हैं।

व्यभिचार पर पिता-पुत्र के उलट विचार
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ वर्ष 2018 में तब सुर्खियों में आ गए थे जब उन्होंने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 को असंवैधानिक करार दे दिया था। सुप्रीम कोर्ट में 10 अक्टूबर 2017 को एक याचिका दाखिल कर दावा किया गया था कि धारा 497 पुरुषों से भेदभाव करती है और संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है। कोर्ट में यह याचिका प्रवासी भारतीय (NRI) जोसफ शाइन ने दाखिल कर धारा 497 की संवैधानिकता को चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया था कि संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ महिला का पति व्यभिचार का केस दर्ज करा सकता है लेकिन संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ मामला दर्ज करने का प्रावधान नहीं है। यह संविधान की भावना के खिलाफ लैंगिक आधार पर भेद करता है। इसलिए इस प्रावधान को गैर-संवैधानिक घोषित किया जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि महिलाओं को अलग तरीके से नहीं देखा जा सकता क्योंकि आईपीसी के किसी भी सेक्शन में लैंगिंक विषमताएं नहीं हैं।

याचिका में कहा गया था कि आईपीसी की धारा 497 के तहत कानूनी प्रावधान, पुरुषों के साथ भेदभाव करते हैं। इस याचिका पर फैसला देते हुए तब के चीफ जस्टिस दीप मिश्रा की पीठ ने कहा कि कोई पति अपनी पत्नी का मालिक नहीं है, लेकिन धारा 497 पत्नी को पति की संपत्ति के रूप में पेश करता है। इसलिए यह असंवैधानिक है। इस पीठ में जस्टिस डीवी चंद्रचूड़ भी शामिल थे। पीठ ने कहा कि पत्नी को पति का जायदाद की तरह पेश करने वाले प्रावधान को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। इसलिए आईपीसी की धारा 497 निरस्त की जाती है।

याद रहे कि 33 साल पहले वर्ष 1985 में जस्टिस डीवी चंद्रचूड़ के सामने भी आईपीसी की धारा 497 की वैधता का मामला उठा था। तब सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार को परिभाषित करने वाली इस धारा को यह कहते हुए बरकरार रखा था कि यह असंवैधानिक नहीं है। तत्कालीन सीजेआई वाईवी चंद्रचूड़ ने जस्टिस आरएस पाठक और जस्टिस एएन सेन की पीठ ने अपने फैसले में लिखा था कि आम तौर पर यह माना जाता है कि संबंध बनाने के लिए फुसलाने वाला आदमी ही होता है, न कि महिला है। इसलिए धारा 497 के तहत व्यभिचार के लिए सिर्फ पुरुष को दोषी मानना सही है।

पिता ने कहा था- आपातकाल सही, बेटे ने कहा- बिल्कुल गलत
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने एक साल पहले वर्ष 2017 में ही अपने पिता के एक और पुराने फैसले को पलटा था। वो मामला आपातकाल में व्यक्ति की स्वतंत्रता का था। जून 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया था। अगले वर्ष 1976 में सुप्रीम कोर्ट ने आपातकाल के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई की। तब जस्टिस एएन राय देश के प्रधान न्यायाधीश थे। उनकी अगुवाई में जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़, जस्टिस पीएन भगवती, जस्टिस एमएच बेग और जस्टिस एचआर खन्ना की पीठ ने कहा कि आपातकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकार को निरस्त किया जा सकता है। पीठ में शामिल जस्टिस एचआर खन्ना ने अकेले इसका विरोध किया था जबकि जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ समेत तमाम जजों ने मौलिक अधिकार पर रोक लगाने को लेकर सहमत थे। इसी तरह, जबलपुर के एडीएम के केस में तब पीठ ने इंदिरा सरकार की तरफ से लगाए गए आपातकाल को सही ठहराया था।

2017 में जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम सप्रे, जस्टिस डीवी चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस ए. अब्दुल नजीर की 9 जजों की पीठ ने 1976 के उस फैसले को गलत बताया। पीठ ने कहा कि भारतीय नागरिकों ने संविधान को अपनाया इसका कतई मतलब नहीं है कि उन्होंने अपने व्यक्गित जीवन और अपने निजी स्वतंत्रता को सरकार के हाथों सौंप दिया। इसलिए आपातकाल लगाकर निजी स्वतंत्रता का हनन करना गैर-संवैधानिक है। पीठ ने कहा कि चार जजों का बहुमत वाला फैसला खामियों भरा था, जबकि जस्टिस खन्ना बिलकुल सही थे। एडीएम जबलपुर जजमेंट के मामले पर बोलते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘जब देशों का इतिहास लिखा जाता है और उसकी समीक्षा होती है तो न्यायिक फैसले ही स्वाधीनता के ध्वजवाहक होते हैं।’ उन्होंने कहा कि चार जजों के उस फैसले में कमियां थीं। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चंद्रचूड़ ने पलटा इमर्जेंसी के दौर में दिया पिता का फैसला
➤ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का भी हिस्सा रहे थे। तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल थे जिसने 9 नवंबर, 2019 राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में फैसला दिया था।

➤ केरल की 25 वर्षीय हिंदू युवती अखिला अशोकन ने शफीन नाम के मुस्लिम लड़के के साथ विवाह करके अपना नाम हादिया रख लिया था। 2016 में हुई शादी को अखिला के परिवार ने इसे लव जिहाद बताया था। उनकी याचिका पर केरल हाई कोर्ट ने शादी रद्द कर दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट का फैसला पलट दिया और दोनों का वैवाहिक जीवन बिताने की अनुमति दे दी। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की इस फैसले में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

➤ नोएडा में सेक्टर 93ए में अवैध ट्विन टावर को गिराने का फैसला सुप्रीम कोर्ट की जिस पीठ से आया था, उसमें जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ शामिल थे। ट्विन टावर को इसी वर्ष 28 अगस्त को गिराया गया।

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