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फ्री की रेवड़ियां बांटने वाले नेताओ, जरा ब्रिटिश PM के इस्तीफे से कुछ सीखिए

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नई दिल्ली

वादा था महंगाई से निजात दिलाने का। अर्थव्यवस्था की हालत डवाडोल थी लेकिन वादा था टैक्स कटौती का। लोकलुभावन वादों के दम पर सरकार भी बन गई। आलोचक चेताते रहे लेकिन उन्हें अनसुना कर टैक्स कटौती का ऐलान भी हो गया। लेकिन हालत बिगड़ गए। महंगाई बेकाबू होने लगी। शेयर बाजार लुढ़कने लगा। मुद्रा कमजोर होने लगी। अर्थव्यवस्था खस्ताहाल होने लगी। वादे पूरे करने में नाकाम साबित हो रहे प्रधानमंत्री ने आखिरकार इस्तीफा दे दिया। हम बात कर रहे हैं ब्रिटेन की और उसकी प्रधानमंत्री लिज ट्रस के इस्तीफे की। प्रधानमंत्री बनने के डेढ़ महीने में ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। लिज ट्रस के इस्तीफे से फ्री की रेवड़ियां बांटने वाले नेताओं को सीखना चाहिए।

बोरिस जॉनसन के इस्तीफे के बाद लिज ट्रस ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनी थीं। टैक्स कटौती, महंगाई से राहत जैसे लोकलुभावन वादों की वजह से ही उन्होंने कंजर्वेटिव पार्टी का आंतरिक चुनाव जीता था। महंगाई कैसे कम होगी, अर्थव्यवस्था कैसे सुधरेगी यह नहीं बताय। पीएम पद की रेस में उनके प्रतिद्वंद्वी रहे ऋषि सुनक ने उसी वक्त चेताया था कि टैक्स कटौती का वादा खतरनाक है क्योंकि इकॉनमी की सेहत ठीक नहीं है। पीएम बनने के बाद ट्रस ने सितंबर में मिनी बजट में टैक्स कटौती का ऐलान किया। लेकिन अर्थव्यवस्था बेपटरी होने लगी। बाजार लुढ़कने लगा। डॉलर के मुकाबले पाउंड कमजोर होने लगा। आम लोग महंगाई की मार से कराहने लगे। पार्टी के भीतर ही उनका विरोध तेज होने लगा। विपक्ष भी हमलावर हो गया। इस बीच 14 अक्टूबर को ट्रस ने वित्त मंत्री क्वासी क्वार्टेग को बर्खास्त कर दिया। जेरमी हंट को नया वित्त मंत्री बनाया। लेकिन नए वित्त मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर टैक्स कटौती समेत पीएम ट्रस के कई फैसलों को गलत करार दे दिया। इतना ही नहीं, हंट ने मिनी बजट में किए गए टैक्स कटौती के ऐलान को वापस ले लिया। पहले से ही विरोध झेल रही ट्रस की इससे काफी किरकिरी हुई और उन्होंने आखिरकार इस्तीफा सौंप दिया।

ब्रिटेन का मौजूदा संकट भारत के लिए भी सबक है। इसके साथ ही चुनाव में मुफ्त की रेवड़ियों के वादे करने वाली पार्टियों और नेताओं के लिए भी सीख है। चुनावी वादे पूरे नहीं होने पर भारत में इस्तीफे की कल्पना ही नहीं की जा सकती। अर्थव्यवस्था की सेहत को दरकिनार कर लोकलुभावन योजनाओं पर आगे बढ़ने का क्या नतीजा होता है ये ब्रिटेन से पहले श्रीलंका में भी दिख चुका है। वहां तो न सिर्फ प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा बल्कि पूरा मुल्क ही कई हफ्तों तक अराजकता की आग में जलता रहा। लेकिन अपने यहां तो ज्यादातर पार्टियां मुफ्त की रेवड़ियों वाले वादों को जैसे सत्ता तक पहुंचाने वाली सीढ़ी समझती हैं। इसी महीने जब चुनाव आयोग ने लोकलुभावन वादों पर पर सख्त रुख अपनाया तो तमाम पार्टियां तिलमिला गईं। इसे ‘लोकतंत्र की ताबूत में कील’ तक करार दे दिया गोया मुफ्त की रेवड़ियों का चुनावी वादा जन्मसिद्ध अधिकार हो। लोकतंत्र का प्राण हो। चुनाव आयोग ने 4 अक्टूबर को राजनीतिक दलों को लेटर लिखा कि सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा, ये भी बताना होगा कि वे पूरे कैसे होंगे, उनके लिए पैसे कहां से आएंगे। आयोग ने कहा कि सिर्फ वैसे चुनावी वादें किए जाने चाहिए जिनको पूरा करना मुमकिन हो।

चुनाव में राजनीतिक दलों की तरफ से ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ (फ्रीबीज) के वादों पर रोक लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है। बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में ‘मुफ्त की रेवड़ी कल्चर’ पर सवाल उठाते हुए उस पर रोक की मांग की है। चुनाव से पहले वोटरों को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार बांटने या मुफ्त उपहार देने का वादा करने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई गई है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा है कि राजनीतिक दलों की ओर से सरकारी फंड से चुनाव से पहले वोटरों को उपहार देने का वादा स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव को प्रभावित करता है। यह एक तरह की रिश्वत है। इसमें केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को प्रतिवादी बनाया गया है।

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