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किसी का इकलौता चिराग बुझा तो कहीं आंगन सूना, 54 बच्चों का काल बना मोरबी पुल

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मोरबी

‘हम मोरबी पुल के गिरने से बचे लोगों की तलाश कर रहे थे। एक छोटा सा हाथ नजर आया, उस हाथ में खिलौना था। हम उस और तेजी से लपके, खिलौना पकड़े वह हाथ गंदे पानी में में डूब गया। मेरा दिल जम गया। यह 9 साल की बच्ची का शव था। हमने उसे अपनी बचाव नाव पर खींच लिया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मैंने अपने जीवन में इस तरह का ऑपरेशन कभी नहीं संभाला। 10. 30 बजे तक, हमने कई बच्चों के शव निकाले। शुरू में शवों की गिनती की लेकिन एक के बाद एक निकली लाशों को देख गिनती भूल गए। सबसे ज्यादा शव मासूम बच्चों के निकल रहे थे।’ यह कहना था क्षेत्रीय अग्निशमन अधिकारी अनिल मारू का। जो रेस्क्यू ऑपरेशन की आंखों देखी बताते हुए रोने लगते हैं। उन्होंने कहा कि आज तक उन्होंने कितने ही रेस्क्यू ऑपरेशन किए लेकिन इस तरह मन को विचलित करने वाला कोई रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं रहा।

इस आपदा में 135 लोगों की मौत हुई, जिनमें से 54 बच्चे थे। जिन 54 मासूम बच्चों के शव बरामद हुए, उनमें से 33 की उम्र 10 साल या उससे कम थी। मोरबी पुल हादसा गुजरात के इतिहास में सबसे बड़ी नागरिक आपदा के रूप में दर्ज की जाएगी, जिसने इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का जीवन लील लिया। इस त्रासदी में मारे गए 48 लड़के थे जबकि 16 लड़कियां शामिल हैं।

2 साल का दुरुक झाला, सबसे कम उम्र का मृतक
मोरबी पुल हादसे में जिस सबसे कम उम्र का जो बच्चा मारा गया, उसकी उम्र 2 साल थी और उसका नाम दुरुक झाला था। उसके पिता सतीश ने बताया, ‘दुरुक मुश्किल से बोल पाता था, लेकिन वह नई चीजों को देखने के लिए उत्सुक था। उसे बाहर जाना पसंद था। इसलिए, जब मेरी बहनें, चंद्रिका, संगीता और मेरे बहनोई सस्पेंशन ब्रिज पर घूमने जा रहे थे तो वह भी जाने की जिद करने लगा। उसने नए कपड़े पहने और उनके साथ चला गया। मैं दिवाली पर उसके लिए दो खिलौने लाया था, वह उन्हें भी साथ लेकर गया था।’

16 साल के बेटे और 19 साल की बेटी को खोया
मोरबी निवासी विनोद सोढिया ने अपने 16 वर्षीय बेटे भौतिक और 19 वर्षीय बेटी भूमिका को इस हादसे में खो दिया। विनोद ने बताया, ‘उनकी छुट्टी थी और वे अपनी मौसी के यहां गए थे। दोनों ने अपने मौसी के बेटों के साथ पुल पर पिकनिक पर जाने का फैसला किया। वहां यह हादसा हो गया। त्रासदी के बारे में सुनने के बाद से मेरी पत्नी रह्यका ने बात नहीं की है। उन्हें बहुत ज्यादा मानसिक अघात लगा है।’

सबसे बड़ी त्रासदी
पिछले दो दशकों में नागरिक लापरवाही के कारण हुई केवल दो अन्य घटनाओं ने इतने बच्चों के जीवन का दावा किया है। 24 मई, 2019 को सरथाना के तक्षशिला आर्केड में अवैध रूप से निर्मित चौथी मंजिल पर एक कोचिंग संस्थान में आग लग गई। हादसे में एक बच्चे समेत 22 बच्चों की मौत हो गई। दूसरा मामला अगस्त 2003 का दमनगंगा पुल ढहने का है, जिसमें 30 लोगों की जान चली गई थी, जिनमें से 28 स्कूली छात्र थे।

कीचड़ में दबे से बच्चों के शव
रविवार रात बचाव अभियान में शामिल एक अन्य अधिकारी ने बताया, ‘बच्चों के शव नीचे कीचड़ में फंस गए। हमें शवों को निकालने के लिए हुक का इस्तेमाल करना पड़ा। जब वह काम नहीं किया, तो दो लोगों ने गोता लगाया और शवों को बाहर निकाला।’

रविवार शाम को, मच्छू नदी में सस्पेंशन पुल गिर गया, जिससे सैकड़ों लोग नदी में गिर गए और कम से कम 135 लोगों की मौत हो गई। इस पुल को अंग्रेजों ने बनाया था। 143 साल पुराने पुल को राज्य की पर्यटन वेबसाइट कलात्मक और तकनीकी चमत्कार के रूप में बताती है। इसे लगभग सात महीने पहले मरम्मत के लिए बंद कर दिया गया था और 26 अक्टूबर को फिर से खोल दिया गया था, जो गुजराती नव वर्ष का पहला दिन था।

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