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लोकसभा उपचुनाव: मैनपुरी और रामपुर में विरासत बचाने के लिए जूझेगी समाजवादी पार्टी

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लखनऊ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर गरमाहट आ गई है। मैनपुरी लोकसभा सीट और रामपुर विधानसभा सीट पर उप चुनावों का ऐलान कर दिया गया है। दोनों सीटों पर 5 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे। 8 दिसंबर को वोटों की गिनती होगी। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी की सीट खाली हुई है। वहीं, आजम खान को सजा के बाद रामपुर विधानसभा सीट पर उप चुनावों का ऐलान किया गया है। मुलायम की गैरमौजूदगी का गम झेल रही सपा के सामने अगली चुनौती विरासत बचाने की खड़ी है। मुलायम के निधन के बाद मैनपुरी लोकसभा का उपचुनाव होना है। वहीं, सपा नेता आजम खान की विधानसभा सदस्यता रद होने के चलते रामपुर विधानसभा का भी उपचुनाव होगा। दोनों ही सीटों के नतीजे सपा की आगे की राह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

मैनपुरी लोकसभा सीट से 1996 में मुलायम सांसद चुने गए थे। 1998 से 2004 के बीच सपा के टिकट पर बलराम सिंह यादव ने मैनपुरी की अगुआई की थी। बलराम कांग्रेस से सपा आए थे। इसके बाद यहां सैफई परिवार ही काबिज रहा। 2004 में मुलायम फिर सांसद बने लेकिन यूपी का सीएम होने के नाते उन्होंने सीट खाली कर दी। उपचुनाव में उनके भतीजे धर्मेंद्र यादव यहां से सांसद बने। 2009 में मुलायम ने फिर मैनपुरी की अगुआई की और 2014 के उपचुनाव को छोड़कर 10 अक्टूबर 2022 तक वह यहां के सांसद बने रहे।

2014 में आजमगढ़ से भी जीतने के चलते मुलायम ने उपचुनाव में पोते तेजप्रताप यादव को सांसद बनाया था। इसी तरह रामपुर विधानसभा सीट 1980 से लेकर 27 अक्टूबर 2022 के बीच 36 साल आजम खान या उनके परिवार के साथ रही है। यह सीट 1996 से 2002 के बीच कांग्रेस के पास थी। वहीं, 2019 में आजम के सांसद चुने जाने के बाद उपचुनाव में उनकी पत्नी तंजीन फातिमा विधायक बनी थी। बाकी अवधि में रामपुर की अगुआई आजम खान ने ही की है।

उपचुनाव में इसलिए अधिक है चुनौती
सपा के दिग्गज नेताओं के गढ़ माने जाने वाली इन सीटों पर चुनाव दर चुनाव भाजपा ने अपनी पैठ बढ़ाई है। 2019 में मैनपुरी लोकसभा के चुनाव में मुलायम सिंह यादव को 94 हजार वोटों से जीत मिली थी जबकि सपा-बसपा दोनों साथ थी, जबकि 2014 में जीत का अंतर 3.64 लाख था। 22 के विधानसभा चुनाव में भी मैनपुरी लोकसभा की दो विधानसभाओं पर भाजपा ने कब्जा जमाया था। इसी तरह रामपुर में भी उपचुनाव आजम के लिए मुश्किल भरा रहा है। 2022 में रामपुर से आजम 60 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन 2019 में जब यहां उपचुनाव हुआ था तो यहां उनकी पत्नी तंजीन को 49 फीसदी वोट और भाजपा उम्मीदवार को 44 फीसदी वोट मिले थे और जीत का अंतर महज 8 हजार ही था।

चिंता इसलिए भी है क्योंकि, इसी साल जून में आजमगढ़ व रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा के दो मजबूत गढ़ भाजपा ने ध्वस्त कर दिए थे। एक बार फिर भाजपा दोनों ही सीटों पर आक्रामक ढंग से लड़ाई की तैयारी कर रही है। इसलिए, सहानुभूति की लहर के बीच भी लड़ाई आसान नहीं होगी। सपा को गढ़ बचाने के लिए पसीना बहाना पड़ेगा।

चेहरा तय करने की भी मशक्कत
सपा के लिए दोनों ही सीटों पर उम्मीदवार तय करने में भी मशक्कत करनी है। मैनपुरी सीट से लगभग तय है कि उम्मीदवार सैफई परिवार से ही होगा। अब चेहरा अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव या तेजप्रताप यादव में कौन होगा, नजरें इस पर टिकी हैं। नजर अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव के रुख पर होगी कि वह साथ रहेंगे या खिलाफ रहेंगे। शिवपाल पहले मैनपुरी से लड़ने की इच्छा जता चुके हैं। इसी तरह आजम खान रामपुर में किसको अपने उत्तराधिकारी के तौर पर उतारेंगे यह कयास जारी है। लोकसभा उपचुनाव में उनकी पत्नी तंजीन फातिमा ने स्वास्थ्य कारणों से चुनाव लड़ने से मना कर दिया था।

उम्मीदवारी परिवार से बाहर गई और सीट हाथ से निकल गई। आजम के छोटे बेटे अब्दुल्ला आजम पहले से ही स्वार टांडा से विधायक हैं। ऐसे में यहां उम्मीदवारी एक मुखर मसला है। कयास यह भी हैं कि परिवार में ही सीट बनाए रखने के लिए आजम की बहू को भी उम्मीदवार बनाया जा सकता है। फिलहाल यहां अंतिम फैसला आजम का ही होगा।

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