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नेपाल में आज पड़ रहे वोट, ओली के समर्थन में चीन ने झोंकी ताकत, भारत-अमेरिका भी सतर्क

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काठमांडू

चारों से जमीन से घिरे नेपाल में आज आम चुनाव हो रहे हैं और इसके परिणाम को लेकर चीन पूरी तरह से सतर्क हो गया है। चीन ने इस चुनाव से ठीक पहले वामपंथी दलों को पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के समर्थन में एकजुट करने की कोशिश की थी। हालांकि उसे सफलता नहीं मिल पाई थी और प्रचंड के नेतृत्‍व वाला धड़ा अभी प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहा है। चीन ने अभी हार नहीं मानी है और उसकी कोशिश है कि चुनाव के बाद किसी तरह से वामदलों को एकजुट करके साल 2017 के इतिहास को दोहराया जाए। वहीं भारत और अमेरिका भी इस पूरे चुनाव पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं। विश्‍लेषकों का मानना है कि नेपाल के चुनाव परिणाम यह निर्धारित करेंगे कि आने वाले समय में अमेरिका, चीन और भारत के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए काठमांडू किस तरह से कदम उठाता है।

भूराजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील नेपाल में 1 करोड़ 79 लाख मतदाता वोट देंगे। नेपाल कभी भारत और कभी चीन के पाले में झूलता रहा है। नेपाल की संसद की 165 सीटों के लिए मतदान हो रहा है। नेपाल में यह चुनाव ऐसे समय पर हो रहा है जब क्षेत्रीय राजनीति में नेपाल का महत्‍व बढ़ता ही जा रहा है। भारत और चीन जहां पहले नेपाल में प्रभाव बढ़ाने की फिराक में लगे रहते थे, वहीं अब अमेरिका भी इस रेस में कूद पड़ा है। अमेरिका की कोशिश है कि भारत और चीन में तनाव के बीच नेपाल में अपने प्रभाव को बढ़ाया जाए जो ड्रैगन का एक पड़ोसी देश है।

चीन ने अपने संस्‍कृति और पर्यटन मंत्री को अचानक काठमांडू भेजा
नेपाली पीएम शेर बहादुर देऊबा के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के बढ़ते प्रभाव से घबराए चीन ने अपने संस्‍कृति और पर्यटन मंत्री ली कून को इस महीने एक असामान्‍य यात्रा पर काठमांडू भेजा था। दरअसल, नेपाल की सीमा तिब्‍बत से मिलती है जो चीन के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्‍वपूर्ण है। नेपाल में बड़े पैमाने पर तिब्‍बती रहते भी हैं। भारत और नेपाल के बीच दशकों से अच्‍छे संबंध रहे हैं। नेपाली गोरखा भारतीय सेना में शामिल होते हैं। यही वजह है कि नेपाल के चुनाव में भारत, चीन और अमेरिका तीनों ही शक्तियों की काफी रुचि है।

नेपाल के अमेरिका में पूर्व राजदूत सुरेश चाल‍िसे कहते हैं कि चुनाव परिणाम यह निर्धारित करेगा कि नेपाल के तीनों ही शक्तियों के साथ रिश्‍ते कैसे रहेंगे। यह चुनाव ऐसे समय पर हो रहे हैं जब पूरे क्षेत्र में राजनीतिक बदलाव का दौर है। इसके फलस्‍वरूप भारत और चीन, चीन और अमेरिका के बीच रिश्‍तों का नेपाल के साथ रिश्‍तों पर सीधा असर पड़ता है। चालिसे कहते हैं कि इस वजह से आने वाले समय में भी नेपाल की तीनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बरकरार रहेगी। नेपाल में साल 2017 में चीन के समर्थन से केपी ओली के सत्‍ता में आने के बाद उन्‍होंने भारत के खिलाफ जमकर जहरीले बयान दिए थे। यही नहीं इस बार चुनाव प्रचार में भी ओली भारत को लगातार चिढ़ा रहे हैं।

भारत के खिलाफ बयानबाजी कर रहे ओली, नई दिल्‍ली सतर्क
ओली ने चीन की राजदूत के इशारे पर नेपाल का नया नक्‍शा जारी किया और कालापानी जैसे विवादित इलाकों को नेपाल का बता दिया था। नेपाल साल 2017 में चीन के बेल्‍ट एंड रोड परियोजना में शामिल हो गया था और अब तिब्‍बत से ट्रेन चलाने की योजना है। ओली के कार्यकाल में चीन के राष्‍ट्रपति भी काठमांडू आए थे। ओली ने अमेरिका को भी किनारे लगाने की कोशिश की और एमसीसी परियोजना को मंजूरी नहीं दी। हालांकि बाद में शेर बहादुर देऊबा की सरकार ने इसे मंजूरी दिलाई। चीन के सरकारी अखबार ग्‍लोबल टाइम्‍स ने देऊबा को भारत समर्थक बता दिया। भारत के लिए अच्‍छी बात यह है कि इस बार के चुनाव में ओली और प्रचंड दोनों ही अलग-अलग लड़ रहे हैं। हालांकि ओली के भारत विरोधी ताजा बयानों से नई दिल्‍ली के कान खड़े हो गए हैं। ओली जहां भारत के खिलाफ बयान दे रहे हैं, वहीं मोदी सरकार शांति से काम ले रही है और चुनाव में मदद के लिए 200 से ज्‍यादा गाड़‍ियों को भेजा है।

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