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1962 में नेहरू पर तरह-तरह से क‍िया गया था वार, क्‍या मोदी के ल‍िए भी हो वही भाषा इस्‍तेमाल? तवांग में झड़प के बाद बीजेपी नेता का हमला

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नई दिल्ली

अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीन के साथ भारतीय सैनिकों की मुठभेड़ पर बीजेपी के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी में पीएम नरेंद्र मोदी को आड़े हाथ लिया है। 1962 का जिक्र कर स्वामी ने कहा कि तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू को भद्दी भद्दी गालियां दी गई थीं, क्योंकि भारत चीन से लड़ाई में हार गया था। उनका सवाल था कि अब मोदी उन विशेषणों से महरूम क्यों हैं। क्या उनके साथ वैसा ही सलूक नहीं किया जाना चाहिए।

स्वामी ने कहा कि तवांग में चीन से भारतीय सेना की झड़प के बाद मोदी कैबिनेट के मंत्री संसद में स्पष्टीकरण दे रहे हैं। लेकिन उन्हें ऐसा क्यों करना चाहिए। उनका कहना था कि गुजरात का सीएम रहते और अब पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी की चीन से नजदीकी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में भारतीय सेना के साथ PLA की मुठभेड़ अगर LAC पर हो रही है तो सरकार के मंत्री क्यों जवाबदेह बनाए जा रहे हैं।

अपने एक और ट्वीट में बीजेपी केस पूर्व सांसद ने कहा कि मोदी जिनपिंग के बीच 18 मीटिंग हो चुकी हैं। वन टू वन की मीटिंग के बाद चीनी राष्ट्रपति मोदी की कमजोरियों को भांप चुके हैं। हमारे प्रधानमंत्री को फोटो खिंचाने का शौक है और कपड़ों के प्रति उनका लगाव किसी से छिपा नहीं है। जटिल वैश्विक मसलों पर वो ज्यादा कुछ नहीं करते। यही वजह है कि जिनपिंग ने Global Power Triangle से उन्हें नेस्तनाबूद कर दिया।

इससे पहले स्वामी ने अपने एक ट्वीट में कहा था कि मोदी ने कोई आया नहीं… कहकर Galwan Depsang and Pangong lake चीन को गिफ्ट में दे दिया। उनका कहना था कि सरकार का ये ही रवैया रहा तो Chusul military airfield भी हम जल्द चीन को सौंपने जा रहे हैं। बीजेपी के पूर्व सांसद का कहना था कि इंडोनेशिया के बाली में मोदी चीन के राष्ट्रपति से हाथ मिलाने के लिए आतुर दिखे। चीनी जानते हैं कि हमारे साथ किस तरह का सलूक करना चाहिए। उन्होंने पीएम पर तंज कसते हुए कहा कि मोदी है तो मुमकिन है।

ध्यान रहे कि अरुणाचल के तवांग में भारतीय सेना की चीनी सेना के साथ मुठभेड़ हुई। 9 दिसंबर को हुई मुठभेड़ की ये खबर सामने आने के बाद विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। सरकार के मंत्री संसद में बता रहे हैं कि किस तरह से उन्होंने चीन को पीछे खदेड़ दिया। लेकिन विपक्ष का सवाल है कि ऐसी नौबत आई क्यों। अगर चीन को लेकर सरकार सशंकित है तो हमारी तैयारियां क्या थीं?

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