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एयर इंडिया पेशाब कांड में पीड़ित महिला की जगह कोई पुरुष होता तब, कैसे लिया जाता एक्शन

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नई दिल्ली

एयर इंडिया पेशाब कांड मामले में इस घटना को आपराधिक रूप से निपटाया जा रहा है, लेकिन इस केस का एक दूसरा पहलू भी है जिस पर गौर करने की जरूरत है। असली मुद्दा पीड़ित यात्री को हुआ नुकसान है। दिल्ली की एक अदालत ने आरोपी शंकर मिश्रा को जमानत देने से इनकार कर दिया है, जिन्होंने नवंबर में एयर इंडिया की एक उड़ान में 70 वर्षीय एक महिला यात्री पर कथित तौर पर पेशाब किया था। मिश्रा पर आईपीसी की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल), 354A (यौन उत्पीड़न), 509 (एक महिला की लज्जा भंग करने का इरादा), 510 (सार्वजनिक रूप से दुराचार) और 294 (अश्लील हरकत) के तहत मामला दर्ज किया गया है। कोर्ट ने कहा कि एक महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के आधार पर जमानत से इनकार किया जाता है। इस दृष्टिकोण में कुछ समस्याएं हैं और इससे एक बड़ी सीख मिलती है। साथ ही एक सवाल यह भी है कि क्या इसकी जगह कोई पुरुष यात्री होता तो मामला इतना गंभीर बनता।

महिला की जगह कोई पुरुष होता तो मामला गंभीर बनता ?
आरोपी शंकर मिश्रा का किसी यात्री पर पेशाब करना अपराध है लेकिन कोई पुरुष होता तब। निश्चित ही मामला इतना गंभीर नहीं होता। यह एक अपने आप में महत्वपूर्ण कारक है। इसलिए, आईपीसी की धाराएं जो महिलाओं के खिलाफ अपराधों या यौन अपराधों से निपटती हैं, इस मामले को एक भ्रामक तरीके से पेश करती है। इस बात का स्पष्ट रूप से कोई सबूत नहीं है कि मिश्रा का कृत्य यौन अपराध के रूप में था। मिश्रा पर आपराधिक मंशा थोपने की बेरुखी उनके हताशा और विचित्र बचाव से भी दिखाई पड़ता है कि पीड़िता ने खुद पेशाब किया।

इस केस से भारत में सीख लेने की जरूरत
इस तरह के मामलों में भारतीय कानून और न्यायिक व्यवहार में ऐसी समस्या दिख रही जो आपराधिक इरादों के बारे में कम और पीड़ित के लिए नकारात्मक परिणामों के बारे में अधिक है। भारत में अभी भी इस तरह के मामलों में कानून की अवधारणा अविकसित है। अपकृत्य कानून (Tort Law)- जिसे अक्सर कानूनी रूप से परिभाषित किया जाता है, जो किसी अन्य के कार्यों या चूक के परिणामस्वरूप हुए नुकसान या अधिकारों के उल्लंघन के मुआवजे से संबंधित है। मिश्रा के मामले से निपटने का यह सबसे अच्छा तरीका होता। उसने अपने साथी यात्री को नुकसान पहुंचाया और इसलिए एक टॉर्ट लॉ के तहत उसे क्षतिपूर्ति करने के लिए कहा जाए। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अपकृत्य मामले दीवानी मामले हैं।

हवाई यात्रियों के दुर्व्यवहार से निपटने का ब्रिटेन में क्या है तरीका
पिछले साल एक ब्रिटिश एयरलाइन कंपनी ने दो भाइयों पर जुर्माना लगाया। हवाई सुरक्षा को खतरे में डालने, उड़ान को डायवर्ट करने और अन्य यात्रियों को असुविधा का कारण बनने के लिए इन पर 50 हजार पाउंड का जुर्माना लगाया गया। वहां की विमान कंपनी ऐसा कर सकती है क्योंकि स्थानीय कानून एयरलाइन को न्यायिक मंजूरी की प्रतीक्षा किए बिना आगे बढ़ने की इजाजत देते हैं। इसके विपरीत, विमान अधिनियम 1934 के आधार पर भारतीय नागरिक उड्डयन के नियमों में ऐसा नहीं है।

भारत में ऐसा क्यों नहीं, कई लोगों को मिल जाती राहत
हमारे यहां अपकृत्य दायित्व के विचार को पर्याप्त रूप से एकीकृत नहीं किया है और यही कारण है कि कई सार्वजनिक और निजी संस्थाएं राज्य के अधिकारी और निजी व्यक्ति गंभीर नुकसान पहुंचाकर बच निकलने में सक्षम हैं। अमेरिका में एक संघीय अपकृत्य दावा अधिनियम है जो संघीय सरकार के किसी कर्मचारी की लापरवाही या गलत कार्य या चूक के कारण व्यक्तिगत चोट, मृत्यु, या संपत्ति के नुकसान या क्षति का सामना करने वाले व्यक्तियों को मुआवजा देता है। भारत की संसद ने कभी भी इस तरह के व्यापक अपकृत्य कानून पर विचार नहीं किया। एक बार भारत में ऐसा हो जाने पर मिश्रा जैसे मामलों को पहले की तुलना में अधिक तार्किक तरीके से निपटा जा सकता है। इससे कई पीडि़तों को फायदा होगा। उदाहरण के लिए, सड़क दुर्घटनाओं के शिकार या उपभोक्ता अदालतों में याचिका दायर करने वाले। सेवा प्रदाता, सरकारी या निजी के बारे में शिकायत करने वालों के लिए भी यही है।

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