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हफ्ते में 4 दिन काम से घटी ग्लोबल वार्मिंग, ब्रिटेन के प्रयोग को अपना रहे कई देश

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नई दिल्ली,

साल 2022 में यूनाइटेड किंगडम की 70 कंपनियों ने एक प्रयोग के तहत अपने कर्मचारियों को हफ्ते में 4 दिन ही काम पर बुलाना शुरू किया. फोर-डे-वर्कवीक के लगभग 6 महीने के ट्रायल के दौरान कर्मचारियों का प्रदर्शन 22 प्रतिशत बेहतर हुआ. ट्रायल के आखिर में ज्यादातर कंपनियों ने माना कि वे हफ्ते में चार दिन काम की प्रैक्टिस को जारी रखेंगी. इसी तरह के ट्रायल बेल्जियम, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी हुए, और नतीजे भी लगभग एक से दिखे.

माना जा रहा है कि काम का ये तरीका लोगों को ज्यादा खुश रखेगा, वे अपनी फैमिली को ज्यादा समय दे सकेंगे और मनपसंद काम भी कर सकेंगे. इसके अलावा भी एक फायदा है, जिसपर पर्यावरणविद बात कर रहे हैं. हफ्ते में चार दिन काम से ग्लोबल वार्मिंग पर काफी हद तक काबू पाया जा सकेगा क्योंकि इससे सीधे-सीधे कार्बन उत्सर्जन कम हो जाएगा.

क्या कहता है प्रयोग
पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था प्लेटफॉर्म लंदन की मदद से हुए प्रयोग में पाया गया कि अगर पूरे ब्रिटेन में हफ्ते में 4 दिन काम का नियम बन जाए तो साल 2025 तक वहां का कार्बन उत्सर्जन 20 प्रतिशत से ज्यादा कम हो जाएगा. ये लगभग उतना है, जितने में पूरे ब्रिटेन में एक दिन के लिए सड़क पर एक भी वाहन का न चलना. इससे सड़कों पर गाड़ियां कम होंगी. दफ्तरों में बिजली की खपत कम हो जाएगी. साथ ही इससे व्यक्तिगत कार्बन फुटप्रिंट भी कम होगा. लोग परिवार के साथ रहते हुए वे आमतौर पर वो काम करते हैं, जिसमें कार्बन फुटप्रिंट ज्यादा नहीं होता, जैसे मिलकर खाना पकाना या बाहर घूमने जाना.

साल 2021 के आखिर में न्यूजीलैंड में भी यूनीलिवर ने 4-डे-वीक की बात की. बेल्जियम ने सरकारी तौर पर इसका एलान कर दिया. वहां फिलहाल यह सिस्टम लागू हो चुका है.बेल्जियम के प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर डी क्रू ने कहा कि कोविड के बाद से लोगों के कामकाज का तरीका बदला है. और अब अगर कर्मचारी सप्ताह में चार दिन काम करना चाहे तो कंपनियां उसे मना नहीं कर सकेंगी. शुरुआत में कर्मचारियों की मेंटल हेल्थ पर फोकस करती इस प्रैक्टिस के अब जाकर पर्यावरणीय फायदे भी दिख रहे हैं. इसकी शुरुआत कोविड में हुई, जब वर्क-फ्रॉम-होम के दौरान बेहद प्रदूषित शहरों में भी हवा पहले से शुद्ध होने लगी.

क्या है कार्बन फुटप्रिंट
कोई शख्स, संस्था या देश नियमित तौर पर जितनी कार्बन डाइऑक्साइड निकालता है, वही उसका कार्बन फुटप्रिंट है. सिर्फ कार्बन ही नहीं, बल्कि मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी कई दूसरी जहरीली गैसें भी हमारी कई तरह की एक्टिविटीज के दौरान निकलती हैं. एक साथ मिलाकर इन्हें ग्रीनहाउस गैस कहते हैं. ये दुनिया का तापमान बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं.

भारत और अमेरिका के कार्बन फुटप्रिंट में कितना फर्क
ये गैसें हमारी जीवनशैली से भी निकलती हैं, जैसे हम क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, किस तरह ट्रैवल करते हैं और किस तरह छुट्टियां मनाते हैं. कोई शख्स छुट्टियां मनाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दूसरे राज्य जाए, या फिर कोई प्राइवेट याच लेकर समुद्र में कई दिनों तक पार्टी मनाए तो ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन ज्यादा पॉल्यूशन करता है. भारत में प्रति व्यक्ति औसत फुटप्रिंट लगभग 1.9 टन है, जबकि अमेरिका में ये 16 टन है, हमसे कई गुना ज्यादा.

अमीर देशों की अमीरी बढ़ा रही प्रदूषण
अध्ययन मानते हैं कि अमीर देश और सिर्फ कुछ अमीर ही अगर अपना फुटप्रिंट कुछ छोटा कर सकें तो ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार पर बड़ा ब्रेन लग सकेगा. पेरिस में एक संस्था है, वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब. (WIL) ये इसी चीज पर काम करती है कि कौन कितना प्रदूषण फैला रहा है. इसके मुताबिक दुनिया के सिर्फ 10 प्रतिशत अमीर लोग ही 50% से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं. इसमें भी जो सबसे ज्यादा रईस हैं, उनका कार्बन फुटप्रिंट सबसे ज्यादा बड़ा है.

हमारे यहां क्या होगा
भारत में भी फोर-डे-वर्कवीक पर विचार चल रहा है. लेबर लॉ के तहत ऐसा किया जा सकेगा, हालांकि इसमें काम के घंटे बढ़ाकर दिन कम करने की बात हो रही है. जैसे लोगों को 8 या 9 की बजाए 12 घंटे काम करना पड़े, तो बदले में वे तीन दिन छुट्टियां ले सकते हैं. हालांकि इसपर अभी बात चल ही रही है, और पक्का नहीं कि सारी कंपनियां इसपर राजी ही हों.

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