नई दिल्ली
आपको 24 जनवरी, 2023 का दिन जरूर याद होगा, जिसे बीते 2 महीने होने जा रहे हैं। यह वह दिन था जब यूएस शॉर्ट सेलर हिंडनबर्ग ने अडानी ग्रुप (पर अपनी रिपोर्ट जारी की थी। इसके बाद कई रेटिंग एजेंसीज ने अडानी ग्रुप के बारे में काफी कुछ नेगेटिव कहा। इससे अडानी ग्रुप की कुल मार्केट वैल्यू में 140 अरब डॉलर से अधिक की गिरावट आई थी। हिंडनबर्ग रिपोर्ट के करीब 2 महीने बाद अब एक मीडिया हाउस ने अडानी ग्रुप पर बड़ा खुलासा किया है। इस रिपोर्ट ने अडानी ग्रुप पर बड़े सवाल खड़े किए हैं। फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि अडानी ग्रुप ऑफशोर फंडिंग के भरोसे चल रहा है। इसके अनुसार, हाल के वर्षों में गौतम अडानी के ग्रुप में आया करीब आधा एफडीआई (FDI) अडानी फैमिली से लिंक्ड विदेशी इकाइयों से आया है।
कुल FDI का 45.5% अडानी से ही लिंक्ड कंपनियों से
एफटी के विश्लेषकों ने भारत के एफडीआई रेमिटेंस आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इससे पता चला है कि अडानी से लिंक्ड ऑफशोर कंपनियों ने साल 2017 से 2022 के बीच ग्रुप में कम से कम 2.6 अरब डॉलर का निवेश किया है। यह इस अवधि के दौरान आए कुल 5.7 अरब डॉलर के कुल एफडीआई का 45.4 फीसदी है।
अस्पष्ट सोर्सेज के फंड से ग्रोथ करता रहा ग्रुप
यह डेटा बताता है कि कैसे अस्पष्ट सोर्सेज के फंड से अडानी को अपना विशाल साम्राज्य बनाने में मदद मिली। अडानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डेवलपमेंट एजेंडे के साथ खुद को अलाइन करते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के दिग्गज के रूप में अपने कारोबार का विस्तार किया। अडानी ग्रुप से लिंक्ड ऑफशोर इकाइयों से निवेश और भी अधिक होने की संभावना है। क्योंकि एफडीआई डेटा विदेशी निवेश के एक हिस्से को ही दर्शाता है।
हिंडनबर्ग ने भी लगाया था शेयरों में हेरफेर का आरोप
अडानी ग्रुप की कर्ज पर टिकी फास्ट ग्रोथ संदेह पैदा करती है। पिछले साल कंपनियों के शेयरों में आई बंपर तेजी ने गौतम अडानी को कुछ समय के लिए दुनिया का दूसरा सबसे अमीर शख्स बना दिया था। लेकिन अडानी की ग्रोथ तब चकनाचूर हो गई, जब जनवरी में यूएस शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि अडानी की कंपनियां 85 फीसदी ओवर वैल्यूड हैं। साथ ही अडानी ग्रुप पर शेयरों में हेरफेर के आरोप भी लगाए गए थे। आरोप लगाया गया कि मॉरीशस स्थित सेल कंपनियों के जटिल नेटवर्क का इस्तेमाल अडानी की 7 लिस्टेड कंपनियों की शेयर प्राइस में हेरफेर करने और बैलेंस शीट को मजबूत करने के लिए होता था। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद से विपक्षी राजनेता अडानी के विदेशी कनेक्शनों की जांच की मांग कर रहे हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस महीने सेबी को दो महीने के भीतर जांच पूरी करने को कहा है।
मॉरिशस की कंपनियों से आया पैसा
अडानी ग्रुप के 5.7 अरब डॉलर के एफडीआई इनफ्लो का करीब आधा ग्रुप से जुड़ी अस्पष्ट विदेशी संस्थाओं से आया था। सितंबर 2022 तक अडानी ग्रुप एफडीआई के रूप में आने वाले धन के भारत के सबसे बड़े प्राप्तकर्ताओं में से एक था। इसने देश में 6 फीसदी इनफ्लो प्राप्त किया। 12 महीने की अवधि में आए ग्रुप के 2.5 अरब डॉलर के एफडीआई में से 526 मिलियन डॉलर अडानी परिवार से जुड़ी दो मॉरिशस कंपनियों से आया। जबकि, करीब 2 अरब डॉलर अबू धाबी की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी से आया।
और ज्यादा हो सकता है ऑफशोर कंपनियों का निवेश
अडानी कंपनियों में अपारदर्शी विदेशी निवेश की पूरी रकम इससे ज्यादा होगी। आधिकारिक एफडीआई आंकड़ों में विदेशी पोर्टफोलिया निवेश (FPI) और लिस्टेड कंपनियों में उनकी चुकता पूंजी के 10 फीसदी से कम राशि का निवेश शामिल नहीं होता है।
विनोद अडानी से लिंक्ड कंपनियां
ग्रुप में एफडीआई डालने वाली अधिकांश ऑफशोर शेल कंपनियां खुद को अडानी के प्रमोटर ग्रुप का हिस्सा बताती है। इसका मतलब है कि वे कंपनियां अडानी या उनके परिवार से जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ा निवेश अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लिंक्ड दो कंपनियों से आया है। इमर्जिंग मार्केट इन्वेस्टमेंट DMCC, जो अपनी वेबसाइट पर बताती है कि वह केवल विनोद अडानी का फंड निवेश करती है। इसने 2017 और 2018 के बीच अडानी की कंपनियों में 631 मिलियन डॉलर निवेश किया। इसी तरह मॉरिशस में रजिस्टर्ड गार्डेनिया ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट ने साल 2021 और 2022 में अडानी की कंपनियों में 782 मिलियन डॉलर का निवेश किया। इमर्जिंग मार्केट के मैनेजर सुबीर मित्रा इसके डायरेक्टर हैं।
अडानी ग्रुप ने नहीं बताई यह बात
अडानी ग्रुप ने हिंडनबर्ग के आरोपों को तो सिरे से नकार दिया। लेकिन इस पर कुछ नहीं बोला कि क्यों उसकी विदेशी फंडिग का एक बड़े हिस्सा उन कंपनियों से आता है, जिसका वास्तविक सोर्स ऑफ फंड स्पष्ट नहीं है। हालांकि, इसने कहा कि ये सभी लेनदेन हमारे अकाउंट्स में बताए गए हैं और साल 2015 से हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार बड़े निवेशक उन कंपनियों में निवेश करने से बचते हैं जहां पारदर्शिता की कमी हो। पारदर्शिता की इस कमी के साथ कोई कंपनी या ग्रुप लॉन्ग टर्म ग्रोथ नहीं पा सकता।
