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PM चेहरे पर चुप्पी, विपक्षी दलों को एकजुट रखने का प्लान… 2024 में 2004 वाले फॉर्मूले की तैयारी

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नई दिल्ली ,

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव दिल्ली दौरे पर हैं. लोकसभा चुनाव के लिए मिशन विपक्षी एकता के तहत वे दिल्ली में नेताओं से मिल रहे हैं. नीतीश-तेजस्वी पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व राहुल गांधी से मिले और उसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी भेंट की. राहुल-खड़गे ने नीतीश से अपनी मुलाकात को विपक्षी एकजुटता के लिए ऐतिहासिक करार दिया है तो नीतीश-केजरीवाल ने भी विपक्ष एकता पर जोर दिया, लेकिन पीएम पद के चेहरे पर कोई पत्ते नहीं खोल रहे हैं.

पीएम मोदी के खिलाफ 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता के लिए सीएम नीतीश कुमार अब पूरे दमखम के साथ जुट गए हैं. माना जा रहा है कि कांग्रेस ने नीतीश को विपक्षी दलों को एकजुट करने की जिम्मेदारी दी है. नीतीश कांग्रेस की लिखी विपक्षी एकता की पटकथा को अमलीजामा पहनाने के मिशन में जुटे हैं. कांग्रेस ने रायपुर के 85वें अधिवेशन में 2024 में विपक्षी एकजुटता वाला 2004 का यूपीए फॉर्मूले पर समान विचाराधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करने की बात कही थी. नीतीश उसी पर कदम आगे बढ़ा रहे हैं. ऐसे में हम बताते हैं कि 2004 में बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकता का फॉर्मूला क्या रहा था.

कांग्रेस का 2004 गठबंधन फॉर्मूला क्या था?
अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए केंद्र की सत्ता में और कांग्रेस विपक्ष में थी. एनडीए से मुकाबले कांग्रेस ने 2003 के शिमला अधिवेशन में गठबंधन की राह पर चलने का प्रस्ताव पास किया था. सोनिया गांधी के नेतृत्व में तमाम विपक्षी दलों के साथ कांग्रेस ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का गठन किया था.

2004 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए से दो-दो हाथ करने के लिए कांग्रेस ने चुनाव से पूर्व पांच राज्यों में समान विचारधारा वाले छह दलों के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरी थी, लेकिन एनडीए के चेहरा अटल बिहारी वाजपेयी के सामने विपक्ष ने किसी भी चेहरे को पीएम कैंडिडेट नहीं बनाया था.

कांग्रेस गठबंधन के ये सहयोगी दल रहे
कांग्रेस उस चुनाव में एनसीपी, टीआरएस, डीएमके, जेएमएम, आरएलडी और एलजेपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरी थी. कांग्रेस महाराष्ट्र में एनसीपी, आंध्र प्रदेश में टीआरएस, तमिलनाडु में डीएमके, झारखंड में जेएमएम और बिहार में आरजेडी-एलजेपी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी थी.

कांग्रेस को इन 5 राज्यों में बड़ा चुनावी फायदा हुआ था और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को नुकसान उठाना पड़ा था. इन पांच राज्यों की कुल 188 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए 114 सीटें जीतने में कामयाब रही थी, जिसमें से 61 सीटें कांग्रेस ने जीती थी जबकि सहयोगी दल 56 सीटें जीतने में सफल रहे थे. वहीं, एनडीए और अन्य विपक्षी दलों के खाते में 74 सीटें आई थीं.

कांग्रेस 2004 में सबसे बड़ी पार्टी रही
2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 417 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 145 जीते थे. वहीं, बीजेपी ने 364 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें 138 पर जीत मिली थी. कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. कांग्रेस की सफलता के पीछे खासकर वो पांच राज्य थे, जहां पर गठबंधन कर चुनाव लड़ा गया था और इन राज्यों में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने 1999 के चुनाव की तुलना में 2004 में पूरा गेम ही बदल दिया था.

चुनाव के बाद पीएम चेहरे पर मुहर
2004 के लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. कांग्रेस ने गठबंधन के दांव से बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया था. लेफ्ट फ्रंट के 59, सपा के 35 और बसपा के 19 सांसदों का समर्थन हासिल कर कांग्रेस ने केंद्र में सरकार बनाने का फैसला किया तब जाकर प्रधानमंत्री पद के लिए नाम पर मुहर लगाई और मनमोहन सिंह पीएम बने थे.

2024 में 2004 का गठबंधन फॉर्मूला
कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी से मुकाबला करने और उन्हें सियासी मात देने के लिए 2004 वाले गठबंधन फॉर्मूले पर आगे कदम बढ़ा रही है. कांग्रेस ने साफ किया है कि 2024 में समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करने की कवायद की जाएगी. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर नीतीश कुमार तक उसी फॉर्मूले पर काम करते नजर आ रहे हैं.

विपक्षी एकता की कवायद तेज
नीतीश कुमार ने राहुल-खड़गे और केजरीवाल से मुलाकात के बाद कहा कि कांग्रेस से पूरी बातचीत हो गई है और तय हो गया है कि विपक्षी एकजुटता के लिए हम लोग काम करेंगे. पूरे देश में और भी पार्टियां हमारे साथ आएंगी. वहीं, केजरीवाल ने भी कहा कि बहुत जरूरी हो गया है कि सारा विपक्ष और पूरा देश इकट्ठा होकर केंद्र की सरकार बदले. वहीं, खड़गे ने विपक्ष को एकजुट करने के प्रयास में डीएमके के एमके स्टालिन और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे सहित अन्य दलों के नेताओं से बातचीत की है. इससे पहले स्टालिन के जन्मदिन पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि पीएम का चेहरा बाद में तय कर लेना, पहले बीजेपी को हरा तो लो.

2004 से 2024 के हालात अलग
कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में 2004 के फॉर्मूले पर विपक्षी एकता बनाने की कवायद जरूर कर रही है, लेकिन इसकी राह आसान नहीं है. 20 साल में देश की सियासत काफी बदल गई है. कांग्रेस 2004 की तरह मजबूत नहीं है तो उस समय साथ रहे कई क्षेत्रीय दल भी साथ छोड़ चुके हैं. 2004 में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली एलजेपी अब बीजेपी के साथ है तो लेफ्ट पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में काफी कमजोर स्थिति में है. यूपी में बसपा और सपा की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है. तेलंगाना की टीआरएस भी कांग्रेस के खिलाफ है.

बीजेपी ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मंत्र पर धीरे-धीरे अपना मजबूत वोट बैंक बना लिया है. मतदाताओं पर बीजेपी की पकड़ को इस बात से भी आंका जा सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में यूपी जैसे राज्य में मजबूत विरोधी गठबंधनों के बावजूद वह आगे निकल गई. बीजेपी के खिलाफ यूपी में बसपा-सपा-आरएलडी, कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस, झारखंड में कांग्रेस के साथ जेएमएम-जेवीएम, बिहार में कांग्रेस-आरजेडी मैदान में थे. फिर भी बीजेपी 2019 में 2014 के लोकसभा चुनाव से भी बड़ी जीत हासिल कर ली थी. ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में 2004 के गठबंधन वाले फॉर्मूले से विपक्ष क्या बीजेपी को चुनौती दे पाएगा?

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