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Wednesday, March 11, 2026
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विश्व के टॉप 150 लीजेंडरी रेस्टोरेंट में लखनऊ का टुंडे कबाब 12वें नंबर पर, जानिए इतना खास क्यों है गलावटी कबाब

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लखनऊ

अमीनाबाद की गलियों में गुजरते हुए आपको एक सुगंध अपनी तरफ खूब आकर्षित करती है, वह है टुंडे कबाबी के कबाब की खुशबू। मुंह में जाते ही घुल जाने वाला यह कबाब अपने बेमिसाल मसालों के कारण 118 साल बाद भी लोगों कह जुबान पर चढ़ा हुआ है। अब इस बेमिसाल स्वाद को वैश्विक स्तर पर पहचान मिली है। टेस्ट एटलस की ओर से विश्व के 150 लीजेंडरी रेस्टोरेंट की लिस्ट जारी की गई है। इसमें लखनऊ के टुंडे कबाबी को भी स्थान मिला है। भारत के रेस्टोरेंट की बात करें तो टुंडे कबाबी से ऊपर कोझिकोड का परगांव रेस्टोरेंट है। यहां की बिरयानी को विश्व के 150 लीजेंडरी रेस्टोरेंट के व्यंजनों में 11वां स्थान मिला है। वहीं, गलावटी कबाब के लिए मशहूर टुंडे कबाब को इस लिस्ट में 12वां स्थान मिला है। टॉप 20 रेस्टोरेंट की बात करें तो इस सूची में चेलू कबाब के लिए मशहूर कोलकाता का पीटर कैट रेस्टोरेंट ने 17वां स्थान हासिल किया है। पहले स्थान पर स्निटजेल विएनर आर्ट के लिए विएना का फिग्लमुलर है।

118 सालों से चल रहा है रेस्टोरेंट
गलावटी कबाब के लिए मशहूर टुंडे कबाबी अमीनाबाद में वर्ष 1905 से चल रहा है। 118 साल में लखनऊ तो बहुत बदला, लेकिन इस रेस्टोरेंट और यहां के गलावटी कबाब का स्वाद-सु्गंध आज भी वही है। भोपाल के नवाबों के शाही महल से लखनऊ की गलियों तक जिस मसालों के साथ कबाब बनाने की रेसिपी के साथ हाजी मुराद अली आए थे। उसे रईस अहमद ने आगे बढ़ाया और अब उनके बच्चे इसे आगे बढ़ा रहे हैं। हाजी मुराद अली 100 जड़ी-बूटी और मुंह में पिघल जाने वाले गलावती कबाब की रेसिपी के साथ वर्ष 1900 के दशक में लखनऊ आए थे। 118 साल पहले लखनऊ में टुंडे कबाब खुला। यहां से अपनी पहचान बनाई। स्वाद के दीवानों को अपना कायल बनाया और जो सफर चला, वह बदस्तूर जारी है।

इस कारण पड़ा टुंडे कबाब नाम
भोपाल के शाही महलों में हाजी मुराद अली खानसामे का काम करते थे। वर्ष 1900 में उन्होंने लखनऊ का रुख किया। 1905 में उन्होंने ओल्ड लखनऊ में एक छोटी सी दुकान खोली। रसीले कबाबों की सुगंध और स्वाद ने लोगों की जुबान को अपना दीवाना बनाना शुरू किया। इसके बाद यह कबाब टुंडे के नाम से मशहूर होने लगा। लेकिन, दुकान का नाम टुंडे कबाब क्यों पड़ा? इसका जवाब यह है कि हाजी मुराद अली का एक हाथ नहीं था। हाजी मुराद अली पतंग उड़ाने के बेहद शौकीन थे। पतंग उड़ाने के दौरान एक हाथ घायल हुआ। इंफेक्शन ऐसा फैला कि हाथ कटवाना पड़ गया। हाजी मुराद अपनी दुकान पर बैठते थे। एक ही हाथ से ग्राहकों को कबाब सर्व करते थे। लोगों ने उन्हें टुंडे कहकर बुलाना शुरू कर दिया। इस तरह दुकान का नाम टुंडे कबाबी पड़ा और यह दुनिया का मशहूर ब्रांड बनकर उभरा।

मसालों के कारण अलग पहचान
टुंडे कबाबी के बाद लखनऊ और अन्य जगहों पर कबाब के कई दुकान खुले, लेकिन स्वाद के मामले में इसके आसपास भी नहीं पहुंच पाए। हाजी मुराद ने जिन मसालों को कबाब में प्रयोग करना शुरू किया, उसे आज भी बरकरार रखा गया है। उसके कॉम्बीनेशन को सीक्रेट रखा गया है। कई मसाले ईरान से मंगाए जाते हैं। इन मसालों को रईस परिवार के सदस्य ही तैयार करते हैं। इसके बारे में बाहरी किसी को भी नहीं बताया जाता है। इस कारण मसालों का यह सीक्रेट लीक नहीं हुआ। भले ही हेवी खाना लोगों को पचने में दिक्कत करता हो, टुंडे कबाबी का गलावटी कबाब अपने मसालों के कारण लोगों के पेट पर कोई खराब प्रभाव नहीं डालता और आसानी से पचता है। इस कारण आज इसे वैश्विक स्तर पर फिर से प्रसिद्धि मिली है।

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