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‘मेरा जाल कहें या कुछ और…’, पवार के प्लान के तहत 2019 में बनी थी अजित-फडणवीस की सरकार!

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नई दिल्ली,

साल 2019, नवंबर 23 की सुबह 8 बजे महाराष्ट्र की राजनीति में तगड़ा भूचाल आया था. इसी दिन बीजेपी की तरफ से देवेंद्र फडणवीस और NCP की तरफ से अजित पवार ने चाचा शरद पवार से बगावत करके सरकार बना ली थी. इसमें देवेंद्र फडणवीस सीएम और अजित पवार डिप्टी सीएम बने थे. हालांकि, दोनों 80 घंटे ही पदों पर रह पाए और फिर ये सरकार गिर गई. इस घटनाक्रम पर अब NCP के सीनियर नेता शरद पवार ने बड़ा दावा किया है.

शरद पवार ने गुरुवार को पुणे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 23 नवंबर, 2019 के उस घटनाक्रम का जिक्र किया. वह बोले कि उस दिन सुबह अजित पवार के साथ फडणवीस के शपथ ग्रहण कार्यक्रम ने साफ कर दिया था कि बीजेपी सत्ता में आने के लिए किसी के भी साथ जा सकती है.

पवार ने आगे कहा, ‘मैं यही साबित करना चाहता था और यह साबित हो गया. आप इसे मेरा जाल कह सकते हैं या कुछ और. यह आपको तय करना है.’ शरद पवार इस बयान के जरिए यह साबित करते दिखे कि अजित पवार ने बगावत नहीं की थी, बल्कि फडणवीस को समर्थन देकर सरकार बनाना और फिर गिरा देना दोनों शरद पवार के प्लान का हिस्सा थे.

बता दें कि आज गुरुवार सुबह देवेंद्र फडणवीस ने 2019 में महाराष्ट्र के राजनीतिक घटनाक्रम का जिक्र करते हुए शरद पवार पर निशाना साधा था. उन्होंने आरोप लगाया कि 2019 में चुनाव नतीजों के बाद एनसीपी के कुछ लोगों ने उनसे संपर्क किया और कहा कि वो एक स्थिर सरकार बनाने के लिए तैयार हैं. फिर इसको लेकर शरद पवार के साथ एक बैठक हुई और फैसला लिया गया कि सरकार बनाई जाएगी. मुझे और अजित पवार को सभी पावर दी गईं. लेकिन शपथ ग्रहण की तैयारियों के बीच शरद पवार ने अपना फैसला वापस ले लिया.

देवेंद्र फडणवीस यह बात पहले भी कह चुके हैं. साल 2019, फिर फरवरी 2023 में भी फडणवीस ने दावा किया था कि बीजेपी और NCP मिलकर सरकार बना रहे हैं ये बात शरद पवार जानते थे और उन्होंने इसका समर्थन भी दिया था. लेकिन बाद में NCP ने रणनीति बदल ली. हालांकि, तब फडणवीस के बयान को गलत बताते हुए शरद पवार ने कहा था कि बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता को इस तरह के झूठे दावे नहीं करने चाहिए.

महाराष्ट्र में साल 2019 में क्या हुआ था?
साल 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी (105 सीटों पर जीत) और शिवसेना (56 सीटों पर जीत) मिलकर चुनाव लड़ी थी. बीजेपी और शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने का स्पष्ट जनादेश मिला था. लेकिन 24 अक्टूबर को नतीजों के बाद दोनों में रार हो गई. दोनों दलों में पावर शेयरिंग को लेकर खींचतान शुरू हो गई. शिवसेना ने ये कहते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावा ठोक दिया कि अमित शाह ने इसका आश्वासन दिया था.

शिवसेना की डिमांड थी कि ढाई-ढाई साल के लिए दोनों पार्टियों से सीएम चुना जाए. बीजेपी इसपर राजी नहीं थी. 288 विधानसभा सीट वाले महाराष्ट्र राज्य में सरकार बनाने के लिए 145 सीट चाहिए थीं. किसी भी पार्टी के पास यह जादूई नंबर नहीं था. फिर केंद्र सरकार ने राज्यपाल की सिफारिश पर 12 नवंबर 2019 को राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

इसके बाद शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने महा विकास अघाड़ी (एमवीए) नाम से गठबंधन बनाया और शरद पवार ने ऐलान किया कि MVA की तरफ से उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री होंगे. लेकिन अभी राजनीतिक ड्रामा मानों शुरू ही हुआ था. 23 नवंबर को अचानक राष्ट्रपति शासन हटाकर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सुबह-सुबह देवेंद्र फडणवीस को सीएम और अजित पवार को डिप्टी सीएम की शपथ दिलवा दी. राज्य में यह खबर आग की तरह फैल गई.

शपथ लेते दोनों नेताओं की तस्वीर सामने आते ही एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने मोर्चा संभाला और और अपनी पार्टी यानी NCP के विधायकों को एकजुट कर लिया. इस बीच शिवसेना, कांग्रेस और शरद पवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. इसके बाद कोर्ट ने 24 घंटे के अंदर बहुमत साबित करने का आदेश दिया. लेकिन सदन में बहुमत साबित करने से पहले ही फडणवीस ने पद से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि NCP ने अब सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. ये सरकार सिर्फ तीन दिन चल सकी.इसके बाद राज्य में महा विकास अघाड़ी (MVA) की सरकार बनी. इसमें कांग्रेस, शिवसेना और NCP तीनों शामिल थीं. MVA ने उद्धव ठाकरे को सीएम बनाया.

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