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मणिपुर में दु:शासनों की भीड़ ने ‘चीर हरण’ किया और हम 75 दिन बाद पीड़ा जता रहे

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नई दिल्ली

जब मणिपुर में महिलाओं का चीर हरण देखकर लोगों का खून खौल रहा है तो कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि राजस्थान और बंगाल में जब महिलाओं से अत्याचार होता है तो देश में इतना हंगामा क्यों नहीं होता? कुछ लोग टूलकिट एंगल भी ले आए हैं। मणिपुर कांड पर सवाल पूछने पर जवाब नहीं उल्टे आपसे ही सवाल पूछे जा रहे हैं कि तब कहां थे? तब क्यों नहीं लिखा? तब क्यों नहीं बोला? संसद में क्यों हंगामा नहीं हुआ? मतलब इस घिनौने कांड पर सियासी खेल शुरू हो गया है। लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है और एक पक्ष यह भी है। मान लेते हैं। लेकिन क्या इस तर्क के आगे दंडवत होकर हम सभी को मणिपुर से अपनी आंखें हटा लेनी चाहिए। क्या सभी को धृतराष्ट्र बन जाना चाहिए? मई से एक प्रांत सुलग रहा है, जून के बाद जुलाई आधा बीत जाता है और केंद्र सरकार के ऐक्शन में फुर्ती नहीं दिखती। मणिपुर वैसे भी दिल्ली से दूर है, वहां की आवाज देर से पहुंचती है। जब वीडियो देखकर पूरा देश दुखी और गुस्से में है तो 75 दिन बाद पीड़ा जाहिर की जा रही है। जबकि हालात महसूस कीजिए तो लगता है कि मणिपुर जलता रहा, वहां लोग मारे जाते रहे और बाकी देश में ऐसा माहौल बना रहा जैसे देश में चहुंओर खुशहाली है। इस पर क्या जवाब होगा कि एफआईआर के दो महीने बाद और वीडियो सामने आने के एक दिन बाद गिरफ्तारी शुरू होती है।

क्या वीडियो का इंतजार कर रही थी पुलिस?
क्या मणिपुर पुलिस और सरकार वायरल वीडियो का इंतजार कर रही थी। क्या हमारे पास ऐसा तंत्र नहीं है कि हम एफआईआर के बाद जांच कर निष्कर्ष तक पहुंच सकें। शर्म है, कलियुग का ऐसा कालखंड आया है कि दु:शासनों की भीड़ इंसानियत की देह से कपड़े उतारती है और कोई उन्हें बचाने नहीं आता। बचाना तो छोड़िए दो महीने तक गुस्सा भी नहीं दिखता। अगर सवाल का जवाब सवाल से ही देना है तब तो हर क्राइम के बाद यही कीजिए। न सरकार को कुछ कहने की जरूरत पड़ेगी, न पुलिस को। हर चीज का कारण तो होता ही है फिर सरकार का क्या रोल है? शासन-प्रशासन क्राइम को नहीं रोक सकता, अंकुश तो लगा सकता है न, चलिए मान लिया अंकुश न सही तो क्राइम होने पर अपराधियों को सजा तो दिलवा ही सकता है न। या फिर सब हवा हवाई है।

डबल इंजन सरकार से अपेक्षा ज्यादा थी
राजस्थान हो या बंगाल, अगर वहां से भी वीडियो आया होता तो बेशक पूरे देश में गुस्सा देखा जाता और घटना होने पर गुस्सा देखा गया है। संसद तक हंगामा भी होता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मणिपुर या दूसरे किसी राज्य में इस तरह की दरिंदगी को इग्नोर कर दिया जाए। जान लीजिए कि यह जनता की अति-अपेक्षा का ही नतीजा है कि लोग मणिपुर में इस तरह की सुस्ती की उम्मीद नहीं कर रहे थे। 9 साल में जनता ने यही जाना और समझा है कि यह सरकार पिछली सरकारों से ज्यादा सख्त और क्राइम-करप्शन पर ‘जीरो टॉलरेंस’ के रास्ते पर चल रही है। वहां तो दो इंजन वाला फॉर्म्युला भी था। केंद्र और राज्य में भी भाजपा की सरकारें हों तो फिर ताबड़तोड़ छापेमारी करने में दो महीने कैसे लग गए?

कुछ लोग टाइमिंग पर सवाल उठा रहे हैं। संसद सत्र से एक दिन पहले वीडियो वायरल क्यों किया गया? यह सवाल सोचकर हंसी आती है कि भाई इस तरह से डरिएगा तब कैसे होगा? सवाल पूछने वाले को टूलकिट कहने वाले जवाब देने से क्यों बचते हैं? क्यों अभी आया, कौन लाया… इससे ज्यादा अहम है कि सरकार ने क्या किया अभी तक? यही सुप्रीम कोर्ट ने भी पूछा है कि बताइए क्या-क्या किया।

अब स्वत: संज्ञान का अलाप
आज अखबारों के पहले पन्ने उठाकर देख लीजिए लाल रंग की स्याही में छपे अक्षर यही सवाल पूछ रहे हैं कि पुलिस को गिरफ्तारी करने में 75 दिन क्यों लगे, वो भी वीडियो आने के बाद? 18 मई को जीरो एफआईआर दर्ज की गई थी तो अब ‘स्वत: संज्ञान’ की बातें क्यों की जा रही हैं। मणिपुर के सीएम कह रहे हैं कि अपने आप संज्ञान लेकर पुलिस ने ऐक्शन लिया और 20 जुलाई की सुबह पहली गिरफ्तारी की।

4 मई को 1000 से ज्यादा लोगों की भीड़ उस गांव को लूटती है। तोड़फोड़ कर आग लगा देती है। तीन महिलाओं के कपड़े उतारे गए, दो की परेड कराई गई। 56 साल के शख्स की 21 साल की बेटी का दरिंदों ने गैंगरेप किया। उसके भाई ने बचाने की कोशिश की तो उसे मार दिया गया। 18 मई को इन तीन महिलाओं में से एक और उसके पति भागकर पुलिस के पास पहुंचे और थाने में जीरो एफआईआर दर्ज की गई। 19 जुलाई को वीडियो आता है। 20 तारीख को सुप्रीम कोर्ट फटकार लगाता है तब दिल्ली में पीड़ा जाहिर करने का दौर चल पड़ता है।

महिलाओं के साथ अत्याचार कहीं नहीं होना चाहिए। लेकिन कम से कम मणिपुर कांड को इग्नोर मत कीजिए। दूसरे उदाहरण देकर मामले को हल्का मत कीजिए, वरना जब आज के दौर का इतिहास लिखा जाएगा तो यही कहा जाएगा कि देश के एक कोने में महिलाओं के कपड़े उतारे गए थे और लोग दूसरे राज्यों की तरफ मुंह करके खड़े थे।

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