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बंगाल में आसान नहीं BJP की राह! 18 से घटकर 8 पर आ सकती है भगवा पार्टी, जानिए वजह

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नई दिल्ली

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 350 सीटों को जीतने का लक्ष्य रखा है। भगवा पार्टी तेलंगाना और केरल जैसे नए ठिकानों की तलाश कर रही है, जबकि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में अपनी स्थिति में सुधार करने की कोशिश कर रही है। जहां उसने 2029 में पहली बार अच्छा प्रदर्शन किया था।

गृह मंत्री अमित शाह ने 2024 में बंगाल भाजपा के लिए 25 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है, लेकिन ममता बनर्जी के राज्य में इस लक्ष्य को पाना बहुत मुश्किल है, बल्कि बीजेपी की सीटों की संख्या 18 से घटकर आठ पर आने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इन सबके बीच भले ही वह 2019 के अपने प्रदर्शन को बरकरार रखती, जब उसने अपने दम पर 303 सीटों का विशाल लक्ष्य हासिल किया था, लेकिन भाजपा के शाह के ‘मिशन’ तक पहुंचने की संभावना नहीं है और बंगाल में बीजेपी की संख्या सिंगल अंक पर आ सकती है। जिसका सबसे बड़ा प्रमुख कारण विपक्षी दलों का गठबंधन INDIA है।

हाल ही में बेंगलुरु में विपक्षी दलों की 18 जुलाई की बैठक हुई थी, जिसने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा और कांग्रेस के नेताओं को चौंका दिया था, क्योंकि सीताराम येचुरी और राहुल गांधी को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ एक मंच पर देखा गया था। इस दौरान राहुल गांधी बंगाल की सीएम ममता से बातचीत में व्यस्त दिखे थे। जबकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस नेता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पर उनके कैडरों के खिलाफ हिंसा करने का आरोप लगाया था। जबकि हिंसा में कई लोगों की मौत हुए थी, लेकिन इन सबके बावजूद बेंगलुरु में विपक्ष की बैठक में एक फैसला लिया गया- ‘एकजुट हम खड़े हैं’। ऐसे में माना जा सकता है कि आने वाले कुछ दिनों में विपक्षी गठबंधन में लोकसभा चुनाव को लेकर सीटों को बंटवारा हो सकता है।

बीजेपी की कम सीटें आने की यह है बड़ी वजह
इसको लेकर न्यूज18 ने सभी राजनीतिक दलों के 2019 लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन विश्लेषण किया है। जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। 2019 में भाजपा द्वारा जीती गई 14 संसदीय सीटें ऐसी हैं जहां विपक्षी गठबंधन (INDIA) को मिले कुल वोट बीजेपी उम्मीदवार से अधिक थे। हालांकि, तब विपक्ष ने अपने उम्मीदवार अलग-अलग उतारे थे, इसलिए बीजेपी जीत गई थी। ऐसी 14 में से 10 सीटें पश्चिम बंगाल से हैं।

सीधे शब्दों में कहें तो, अगर विपक्षी गठबंधन (INDIA) सीट-बंटवारे के चरण पर पहुंचता है तो बीजेपी पश्चिम बंगाल में 10 सीटें खो सकती है, भले ही वह 2019 जैसा अच्छा प्रदर्शन करे। पिछली बार बीजेपी को 18 सीटें मिली थीं। तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के नेतृत्व में पार्टी के लिए पहली बार इसका प्रभावी अर्थ यह होगा कि संख्या घटकर आठ हो जाएगी। यानी सिंगल डिजिट और शाह के ‘मिशन 25’ से काफी दूर।

कई हाई प्रोफाइल नेताओं की सीट पर मंडरा सकता है खतरा
उन 10 सीटों में – जहां टीएमसी, कांग्रेस और वाम मोर्चा एक साथ लड़ते हैं। कुछ हाई-प्रोफाइल नाम हैं। इनमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री निसिथ प्रमाणिक भी शामिल हैं, जो पिछली बार कूच बिहार लोकसभा क्षेत्र से लड़े थे। ऐसा माना जाता है कि प्रमाणिक ने राजबंशी नेता अनंत महाराज को मनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, क्योंकि भाजपा ने उन्हें बंगाल से भगवा पार्टी की पहली राज्यसभा सीट के लिए मैदान में उतारने का फैसला किया था।

ऐसे में केंद्रीय राज्य मंत्री शांतनु ठाकुर की भी सीट खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि उनकी लोकसभा सीट बोनगांव इसी सूची में आती है। वो ठाकुर मटुआ समुदाय का चेहरा भी हैं, जिसमें एक बड़ा हिस्सा शामिल है और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रूप से प्रासंगिक है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल ‘मटुआ धर्म महा मेला’ के उद्घाटन के दौरान उनके नाम को लेकर संबोधित किया था।

आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा की बंगाल इकाई के अध्यक्ष सुकांत मजूमदार की भी सीट पर खतरा मंडरा सकता है, जिन्होंने हाल ही में राज्य में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा की शिकायत करने के लिए अमित शाह से मुलाकात की थी। उनकी सीट बालुरघाट भी उन 10 उच्च जोखिम वाली सीटों में से एक है, जो विपक्षी गठबंधन के सीट-बंटवारे समझौते पर पहुंचने पर भाजपा हार सकती है।

जोखिम भरी 10 सीटों में यह भी सीटें शामिल
जोखिम भरी 10 सीटों में अन्य सीटें भी हैं- बर्धमान जहां से एसएस अहलूवालिया जीते, बैरकपुर जहां से अर्जुन सिंह (अब टीएमसी में शामिल हो गए) जीते, बिष्णुपुर जहां से सौमित्र खान विजयी हुए, हुगली जहां से पार्टी की तेजतर्रार महिला नेता लॉकेट चटर्जी ने जीत हासिल की और झारग्राम। जिसमें इंजीनियर से नेता बने कुमार हेम्ब्रम की जीत हुई। मालदाहा उत्तर और रायगंज भी जोखिम भरी उन 10 की सीटों में शामिल हैं, जहां से खगे मुर्मू और देबाश्री चौधरी ने क्रमशः भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की थी। चौधरी पहले मोदी की मंत्रिपरिषद में थे।

हालांकि, डेटा कभी झूठ नहीं बोलता, लेकिन राजनीति अक्सर कई कारणों से प्रभावित होती है। सबसे पहले विपक्षी गठबंधन यानी INDIA के घटक दलों इस डेटा को समझने के लिए सीट-बंटवारे के समझौते पर पहुंचना होगा। फिलहाल विपक्ष गठबंधन अभी तक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। 2021 में पश्चिम बंगाल में टीएमसी सत्ता में वापस आई। उस राज्य में इस बात की बहुत कम संभावना है कि पार्टी अपने सहयोगियों को कोई भी सीट देने के लिए राजी होगी।

TMC-Congress के पश्चिम बंगाल में हिंसा एक बड़ी वजह
इसके अलावा, कांग्रेस और वाम मोर्चा का स्थानीय नेतृत्व अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के किसी ऐसे व्यक्ति के साथ सहयोग करने के फैसले से नाराज हैं, जिसे वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं। प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता कौस्तव बागची राज्य की हिंसा को लेकर ममता सरकार को घेरा था। उन्होंने कहा था कि यह सब टीएमएसी के कारण हुआ है कि राज्य में आठ कांग्रेस कार्यकर्ता मारे गए। हमने हाईकमान को इसको लेकर जानकारी दी है कि हम टीएमसी के साथ कोई भी गठबंधन स्वीकार नहीं करेंगे।

वामपंथी नेताओं की सोच अलग है। हालांकि वे बागची की तरह मुखर नहीं हैं। इसलिए, भले ही INDIA सीट-बंटवारे के समझौते पर पहुंचता है, लेकिन इसे मजबूत करने के लिए राज्य नेतृत्व को इसमें शामिल करना जरूरी होगा, लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। विपक्षी गठबंधन के लिए एक चिंता का विषय यह भी है कि भले ही राज्य नेतृत्व को लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, वाम और टीएमसी के बीच किसी भी संभावित सीट बंटवारे को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है, लेकिन उसके बाद भी वोटों को ट्रांसफर चिंता का बड़ा विषय है।

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