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वाजपेयी का सपना फेल, हिंदी मीडियम में इंजीनियरिंग की डिग्री के लिए नहीं मिल रहे छात्र

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भोपाल

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का एक सपना था। उनका मानना था कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए। ऊंची से ऊंची शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए। उनकी अपनी पार्टी बीजेपी की सरकारों ने वाजपेयी की इच्छा का ध्यान रखते हुए हिंदी मीडियम में इंजीनियरिंग के कोर्स शुरू किए। मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी माध्यम में इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स शुरू किए गए। मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (मैनिट), भोपाल में भी हिंदी मीडियम में इंजीनियरिंग के डिग्री कोर्स की शुरुआत हुई। मध्य प्रदेश में अब एमबीबीएस कोर्स भी हिंदी मीडियम में शुरू करने की तैयारी हो चुकी है। इसके बावजूद वाजपेयी का सपना फेल होता दिख रहा है। इसका कारण यह है कि हिंदी मीडियम में इन डिग्रियों के लिए छात्र नहीं मिल रहे। हिंदी विश्वविद्यालय में इसी चलते कई कोर्स बंद हो चुके हैं और मैनिट की हालत भी कुछ ऐसी ही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक मैनिट में पिछले साल 150 छात्रों ने हिंदी मीडियम से इंजीनियरिंग कोर्स में एडमिशन लिया था। अब इनमें से 27 ही बचे हैं। संस्थान के डायरेक्टर केके शुक्ला का कहना है कि हिंदी मीडियम के छात्रों के लिए कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन इसके अच्छे नतीजे नहीं मिल रहे। छात्र अब भी उलझन में हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी यूनिवर्सिटी में भी यही हाल देखने को मिला था। 2011 में शुरू हुई यूनिवर्सिटी में हिंदी मीडियम में 134 मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य तकनीकी कोर्स शुरू किए गए थे। इनमें से 70 से ज्यादा कोर्स अब बंद हो चुके हैं। संस्थान के अधिकारियों का कहना है कि अधिकतर कोर्सेज को एआईसीटीई से अप्रूवल नहीं मिलने के कारण बंद करना पड़ा। लेकिन सच्चाई इतनी ही नहीं है। अनुवाद किया हुआ सिलेबस और किताबें छात्रों की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहीं। हिंदी मीडियम के छात्रों को स्टडी मटेरियल नहीं मिल पा रहीं। हिंदी माध्यम में पढ़ाने वाले योग्य शिक्षक भी नहीं मिलते।

छात्रों को सबसे बड़ी चिंता जॉब अपॉर्च्युनिटिज को लेकर है। हिंदी मीडियम में एडमिशन लेने वाले अधिकांश छात्र भी शिक्षकों से पूछते हैं कि उनकी डिग्री पर हिंदी तो नहीं लिखा होगा। उन्हें डर है कि हिंदी मीडियम की डिग्री से उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कतें आएंगी। छात्रों की उलझन बिलकुल जायज हैं। जॉब मार्केट में इंग्लिश-स्पीकिंग प्रोफेशनल की मांग ज्यादा है। जब तक सरकारें हिंदी भाषा को जॉब मार्केट की जरूरतों से नहीं जोड़ेंगी, हिंदी मीडियम में प्रोफेशनल कोर्सेस पर संदेह बना रहेगा। यदि बिना सोचे-समझे हिंदी मीडियम के कोर्स शुरू किए जाएंगे तो उनका हश्र ऐसा ही होगा।

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