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सिमुलेटर के सहारे क्या मिल पाएगी सेना को फायर पावर में बढ़त? 40% कम हो चुकी है फील्ड फायरिंग रेंज

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नई दिल्ली

हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना को दो फायरिंग रेंज उपलब्ध कराई गई जो लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल से करीब 50 किलोमीटर की एयर डिस्टेंस पर हैं। ये फायरिंग रेंज सेना के लिए ऑक्सिजन की तरह हैं क्योंकि पिछले कुछ वक्त में भारतीय सेना की ‘फील्ड फायरिंग रेंज’ लगातार घटती गई हैं। सूत्रों के मुताबिक करीब डेढ़ दशक में भारतीय सेना की फील्ड फायरिंग रेंज करीब 40 पर्सेंट कम हो गई हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए सिमुलेटर्स का सहारा लिया जा रहा है लेकिन जानकारों का कहना है कि सिमुलेटर्स पूरी तरह असल ट्रेनिंग की जगह नहीं ले सकते।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया है कि किसी भी युद्ध में बढ़त हासिल करने के लिए फायर पावर बड़ा फैक्टर है। इजरायल-हमास जंग में मिसाइल दागने की तस्वीरें लगातार आ रही हैं। भारतीय सेना भी अपनी फायर पावर को लगातार बढ़ाने में जुटी है। लेकिन क्या बिना फील्ड फायरिंग रेंज के सैनिकों को वह महारत हासिल हो पाएगी? यह सवाल इसलिए क्योंकि सेना की फील्ड फायरिंग रेंज लगातार कम होने से ट्रेनिंग के लिए सेना सिमुलेटर पर भरोसा कर रही है।

भारतीय सेना से रिटायर्ड ब्रिगेडियर संदीप थापर कहते हैं कि सिमुलेटर्स से वह कॉन्फिडेंस नहीं आ सकता जो असल फायर ट्रेनिंग से आता है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के वक्त में जब सेना को कई रेंज दी गई थी उस वक्त वहां दूर-दूर तक आबादी नहीं थी। तब राज्य सरकारों को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन बाद में जैसे-जैसे आबादी बढ़ने लगी तो राज्यों ने लीज रिन्यू नहीं की। अब हाल ये है कि अगर फील्ड फायरिंग करनी है तो बहुत दूर-दूर जाना होता है। आर्टिलरी, टैंक और एयरडिफेंस के लिए फील्ड फायरिंग बहुत जरूरी है। कई राज्य को क्रॉस करके दूर-दूर फील्ड फायरिंग करने जाना होता है। उसमें भी खर्चा होता है। जब तक सैनिक रेंज में फायर नहीं करेंगे तब तक उन्हें कॉन्फिडेंस नहीं आएगा। इस मसले को रक्षा मंत्रालय को गंभीरता से देखना चाहिए। क्योंकि यह दिक्कत आगे और बढ़ेगी। यह कैपेबिलिटी को इफेक्ट करती है। इसका इलाज ढूंढना पड़ेगा।

सिमुलेटर्स बढ़ाने पर भी जोर
अभी सेना के पास जो फील्ड फायरिंग रेंज हैं वह दो तरह की हैं- फौज की ही जमीन जो फायरिंग रेंज के लिए एक्वायर की हैं और दूसरी तरह की फायरिंग रेंज, जिन्हें वक्त वक्त पर राज्य सरकारें फायरिंग रेंज के तौर पर नोटिफाई करती हैं। पिछले कुछ सालों में कई राज्य सरकारों ने फायरिंग रेंज को नोटिफाई नहीं किया है। हर सैनिक को साल में कम से एक बार पूरी ट्रेनिंग करनी होती है। फील्ड फायरिंग रेंज कम होने से अलग-अलग यूनिट को ट्रेनिंग का कम वक्त मिल पा रहा है। सेना सिमुलेटर्स पर जोर दे रही है हालांकि अभी सिमुलेटर्स की संख्या भी इतनी नहीं है जिससे हर सैनिक की उस पर ट्रेनिंग हो सके। सिमुलेटर्स के साथ ही वास्तविक स्थितियों में फील्ड फायरिंग रेंज में ट्रेनिंग की अपनी अहमियत है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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