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दोषियों की रिहाई के रिकॉर्ड को ट्रांसलेट करके सौंपे सरकार, बिलकिस बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

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अहमदाबाद/नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो केस में गुजरात सरकार के दोषियों की जल्द रिहाई के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और गुजरात सरकार को 16 अक्टूबर तक दोषियों को रिहाई से जुड़े रिकॉर्ड को ट्रांसलेशन के साथ दाखिल करने का आदेश दिया है। इसके बाद कोर्ट ने फैसले को रिजर्व कर लिया। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने काफी दिनों से इस मामले की सुनवाई कर रही थी। 2002 दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप और उसके परिवार के सदस्यों की हत्या के मामले 11 दोषियों की जल्द रिहाई को चुनौती दी गई थी। गुजरात सरकार ने इस दोषियों को 2022 में 15 अगस्त के दिन रिहा किया था। रिहाई के बाद फूल-मालाओं से स्वागत किए जाने पर मामले ने तूल पकड़ लिया था। दोषियों ने जेल में 15 साल की सजा काटी थी।

‘धर्म के नाम पर था अपराध’
सुप्रीम कोर्ट में दोषियों की रिहाई पर फैसला सुरक्षित होने से पहले वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने अपने जवाबी तर्क में कहा कि मामले में शीर्ष अदालत का फैसला संविधान की अंतरात्मा को प्रतिबिंबित करेगा। इंदिरा जयसिंह ने दोहराया कि छूट के आदेश ‘कानून की दृष्टि से खराब’ हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शीघ्र रिहाई के लिए आवेदन का निर्धारण करने में शीर्ष अदालत द्वारा बताए गए सिद्धांतों को लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिलकिस बानो के खिलाफ किया गया अपराध ‘प्रेरित’ था और देश की अंतरात्मा शीर्ष अदालत के फैसले में प्रतिबिंबित होगी। पिछली सुनवाई में उन्होंने दलील दी थी कि 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के दौरान बिलकिस बानो के खिलाफ किया गया अपराध धर्म के आधार पर किया गया ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ था।

रिहाई पर उठाए सवाल
अपनी जवाबी दलीलों में वकील वृंदा ग्रोवर ने जुर्माने का भुगतान न करने के बावजूद गुजरात सरकार द्वारा दोषियों की रिहाई पर सवाल उठाया। जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने पीड़िता को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक जुर्माना अदा नहीं किया जाता या जुर्माना अदा न करने पर सजा नहीं भुगत ली जाती, तब तक दोषी छूट पर बाहर नहीं आ सकते। उन्होंने यह भी कहा कि दोषियों को ‘अवैध समयपूर्व रिहाई’ दी गई है। अंतिम सुनवाई शुरू होने के बाद दोषियों ने मुंबई में ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और ‘विवाद को कम करने’ के लिए उन पर लगाया गया जुर्माना जमा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष अदालत के समक्ष दायर उनके आवेदन के नतीजे की प्रतीक्षा किए बिना जुर्माना जमा करने पर सवाल उठाया था। अदालत ने दोषियों से पूछा था, आप अनुमति मांगते हैं और फिर अनुमति प्राप्त किए बिना जमा कर देते हैं? याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा था कि दोषियों ने उन पर लगाए गए जुर्माने का भुगतान नहीं किया है और जुर्माना न भरने से सजा माफी का आदेश अवैध हो जाता है।

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