नई दिल्ली
मौनं स्वीकृतिः लक्षणम् – संस्कृत के इस कहावत का उपयोग हम अपने दैनिक जीवन में करते रहते हैं, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका हवाला देकर बड़ा फैसला कर लिया। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इस संस्कृत कहावत के हवाले से वो तीन नियुक्तियां कर दीं, जिनके नामों पर सरकार ने चुप्पी साध ली थी। कॉलेजियम ने कहा- मौनं स्वीकृत लक्षणम् यानी सरकार चुप है, इसका मतलब है कि वो प्रस्ताव से सहमत है। ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के मेमोरेंडम ऑफ प्रसीजर में एक प्रावधान ही ‘मौनं स्वीकृतिः लक्षणम्’ से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी प्रावधान का उपयोग किया है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में विभिन्न हाई कोर्टों में 13 न्यायिक अधिकारियों और पांच अधिवक्ताओं की नियुक्ति की सिफारिश केंद्र सरकार से की है। इनमें से तीन की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ‘मौनं स्वीकृतिः लक्षणम्’ के प्रावधान का उपयोग किया। बड़ी बात है कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इस प्रावधान का उपयोग दुर्लभ ही है।
नियुक्ति प्रक्रिया की नियमावली में है यह प्रावधान
हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति प्रक्रिया वाले नियम (MoP) के पैरा 14 में कहा गया है कि यदि हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से प्रस्ताव प्राप्त होने की तारीख से छह सप्ताह के भीतर राज्य सरकार के संवैधानिक अधिकारियों की टिप्पणियां प्राप्त नहीं होती हैं तो केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय यह मान लेगा कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री के पास प्रस्ताव में जोड़ने के लिए कुछ नहीं है और मंत्रालय इस प्रस्ताव को आगे बढ़ा देगा।
मौनं स्वीकृतिः लक्षणम् के प्रावधान से इन तीन जजों की नियुक्ति
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. कौल और जस्टिस संजीव खन्ना के कॉलेजियम ने तीन न्यायिक अधिकारियों की जज के रूप में नियुक्ति के लिए मौनं स्वीकृतिः लक्षणम् के प्रावधान वाले एमओपी के पैरा 14 का उपयोग किया। इनमें दो न्यायिक अधिकारियों बिस्वजीत पालित और सब्यसाची डी. पुरकायस्थ को त्रिपुरा हाई कोर्ट के जज जबकि विमल कन्हैयालाल व्यास को गुजरात हाई कोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किया गया है।
