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10 साल में आर्कटिक से गायब हो जाएगी बर्फ, दुनिया पर आएगी इतनी बड़ी आफत

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न्यूयॉर्क,

सिर्फ 10 साल और. उसके बाद आर्कटिक में बर्फ नहीं दिखेगी. इससे दुनिया भर के मौसम और समुद्री जलस्तर पर असर पड़ेगा. यह चेतावनी वैज्ञानिकों ने एक स्टडी के बाद दी है. यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर में हुई स्टडी के मुताबिक आर्कटिक में गर्मियों के मौसम में भी बर्फ दिखती है. लेकिन अगले कुछ वर्षों में यह खत्म हो जाएगी.

10 साल में गर्मियों के मौसम में आर्कटिक में बर्फ दिखना बंद हो जाएगी. यह स्टडी हाल ही में नेचर रिव्यू अर्थ एंड एनवायरमेंट जर्नल में प्रकाशित हुई है. इसमें कहा गया है कि है वह दिन दूर नहीं जब आर्कटिक से बर्फ लापता हो जाएगी. यह 10 वर्षों के अंदर ही होगा. क्योंकि जिस हिसाब से तापमान बढ़ रहा है, वह खतरनाक है.

ऐसा नहीं है कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करेंगे तो यह स्थिति नहीं आएगी. हर तरह की स्थितियों की जांच के बाद वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि दस साल में बर्फ पिघलना तय है. इस सदी के मध्य तक आर्कटिक के समंदर में सितंबर महीने में बर्फ देखने को मिलेगी ही नहीं. सदी के अंत तक यह नजारा कई महीनों तक दिखाई देगा.

कितनी बर्फ रहेगी कि उसे जीरो मान लिया जाए
अगर कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन ज्यादा हुआ या अभी जैसा है, उस स्थिति में भी धरती के उत्तरी इलाके में सर्दियों में भी कम बर्फ देखने को मिलेगी. इसका मतलब ये नहीं है कि बर्फ एकदम नहीं बचेगी. वैज्ञानिक भाषा में जब आर्कटिक में 10 लाख वर्ग किलोमीटर बर्फ रहती है, तो उसे बिना बर्फ का आर्कटिक कहते हैं.

इस इलाके में सबसे कम बर्फ 1980 में देखा गया था. हाल के वर्षों में आर्कटिक में सितंबर महीने में सबसे कम बर्फ 33 लाख वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया था. यह स्टडी करने वाली साइंटिस्ट एलेक्जेंड्रा जान ने वर्तमान, इतिहास और उत्सर्जन के हिसाब से कंप्यूटर मॉडल्स बनाए. फिर उस आधार पर भविष्य में बर्फ की मात्रा का विश्लेषण किया.

सितंबर महीने में नहीं दिखेगी आर्कटिक में बर्फ
पता चला कि हर साल अगर 1 वर्ग किलोमीटर बर्फ पिघलती है तो अधिकतम 18 साल में आर्कटिक की बर्फ गर्मियों में खत्म हो जाएगी. अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी दर से रहा तो कम से कम दस साल में यह नजारा देखने को मिल सकता है. यानी 2030 के दशक में आर्कटिक इलाके में सितंबर महीने में बर्फ देखने को नहीं मिलेगी.

इसका असर आर्कटिक के जानवरों पर सबसे ज्यादा पड़ेगा. जैसे सील और ध्रुवीय भालू. जैसे ही आर्कटिक सागर गर्म होगा, उस इलाके में वो मछलियां पहुंचेंगी, जो वहां नहीं रहतीं. इससे स्थानीय ईकोसिस्टम पर नई प्रजातियों का घुसपैठ होगा. उसका असर कितना होगा, ये पता करना बहुत मुश्किल है.

लहरों की तेज टक्कर से होगा मिट्टी में कटाव
दूसरी बड़ी दिक्कत ये होगी कि बर्फ के पिघलने से समंदर की लहरे तटों से तेजी से टकराएंगी. इससे तटीय इलाका कट-कटकर समंदर में गिरेगा. जमीन कम होती जाएगी. जानवरों को रहने की जगह की कमी होगी. फिलहाल की आशंका के मुताबिक आर्कटिक के गर्मियों के महीने यानी अगस्त से अक्टूबर तक समंदर में बर्फ नहीं दिखेगी.

अगर बहुत ज्यादा उत्सर्जन हुआ तो इस सदी के अंत तक आर्कटिक का इलाका 9 महीनों के लिए बिना बर्फ का होगा. इससे आर्कटिक का पूरा इलाका बदल जाएगी. अभी वहां की गर्मियों में सफेद बर्फ दिखती है. लेकिन फिर नीला समंदर दिखेगा. इसलिए जरूरी है कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम से कम किया जाए.

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