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क्या भारत के चुनावों में दखल दे रहा है अमेरिका? बाइडन प्रशासन पर क्यों भड़के विशेषज्ञ

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वॉशिंगटन

भारत में लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही अमेरिका सक्रिय हो गया है। पिछले कुछ दिनों में अमेरिकी प्रशासन ने कई ऐसे बयान दिए हैं और काम किए हैं, जिसे सत्तारूढ़ मोदी सरकार के खिलाफ माना जा रहा है। कई कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना कि अमेरिका अन्य देशों की तरह भारत के चुनाव में भी हस्तक्षेप की कोशिश कर रहा है। इससे पहले अमेरिका ने बांग्लादेश के चुनाव को भी ऐसे ही प्रभावित करने की कोशिश की थी। अमेरिका के इन बयानों का मकसद चुनाव से पहले मोदी सरकार को घेरना है। यही कारण है कि बाइडन प्रशासन लगातार भारत के अंदरूनी मामलों में दखल दे रहा है। हालांकि, भारत ने हर मौके पर अमेरिका के बयानों और कारस्तानियों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कुछ दिन पहले ही भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी दूतावास की प्रभारी को तलब कर अपना विरोध जताया था।

भारत-अमेरिका के लिए विवादों वाला हफ्ता
रैंड कॉर्पोरेशन में नेशनल सिक्योरिटी और इंडो-पैसिफिक के विश्लेषण डेरेक जे. ग्रॉसमैन ने एक्स पर लिखा, “अमेरिका-भारत साझेदारी का सप्ताह खराब रहा। केजरीवाल विवाद, सीएए विवाद, बाइडन का पाकिस्तान को पत्र, अमेरिकी दूतावास ने कश्मीरियों को इफ्तार पार्टी का न्योता दिया। जयशंकर का कहना है कि भारत और रूस एक-दूसरे का अच्छा ख्याल रखते हैं।”

भारतीय विशेषज्ञ ने अमेरिका को लताड़ा
वहीं, भारत के वरिष्ठ कूटनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने लिखा, ” टीम बाइडन ने अधिकारियों के खिलाफ वीजा प्रतिबंधों की धमकी देकर बांग्लादेश के चुनावों में हस्तक्षेप करने की कोशिश की। लेकिन हसीना की सत्ता में वापसी के बाद इसने मेलजोल की कोशिश की। अब, इसकी नई सक्रियता भारत की चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के इरादे का संकेत देती है।”

क्या मोदी सरकार को पसंद नहीं करता बाइडन प्रशासन
रूस-यूक्रेन युद्ध, जलवायु परिवर्तन, डब्लूटीओ विवाद समेत कई मुद्दों पर भारत का डटकर खड़ा रहना अमेरिका को पसंद नहीं आया है। अमेरिका अब तक शीत युद्ध की मानसिकता से बाहर नहीं निकल सका है। अमेरिका आज भी यही सोचता है कि पूरी दुनिया में उसी की दादागिरी चलती है। हालांकि, भारत ने यह दिखा दिया है कि सिर्फ हमें ही अमेरिका के साथ की जरूरत नहीं है, बल्कि अमेरिका को भी भारत की उतनी ही जरूरत है। रूस-यूक्रेन युद्ध में अमेरिका ने भारत पर बहुत दबाव डाला। यहां तक कि भारत पर प्रतिबंध लगाने की धमकी तक दी, लेकिन मोदी सरकार टस से मस नहीं हुई। यही कारण है कि अमेरिका को अपना राग बदलना पड़ा। ऐसा ही जलवायु संकट और डब्लूटीओ विवाद में भी देखने को मिला।

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