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Thursday, May 7, 2026
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रूस और चीन आ रहे साथ, भारत नहीं कर सकता अनदेखा, ‘भालू और ड्रैगन’ की दोस्‍ती पर एक्सपर्ट्स ने दी बड़ी चेतावनी

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मॉस्को/बीजिंग:

रूस भारत का पुराना सहयोगी है। लेकिन रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने पांचवीं बार पद संभालते ही चीन का दौरा किया। उनका यह दौरा पश्चिमी देशों को बड़ा संदेश है। लेकिन रूस और चीन में बढ़ती निकटता भारत के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। आज भी भारतीय रणनीतिक सोच की भ्रांति में से एक उन ताकतों को कमजोर करना है जो मॉस्को को बीजिंग के साथ जोड़ती है। माना जाता है कि रूस भारत का ऐतिहासिक मित्र है और वह कभी भी चीन के एक जूनियर पार्टनर का दर्जा स्वीकार नहीं करेगा। यह दावे सिर्फ इतिहास को देखकर किए जाते हैं, न कि आज रूस के हालात को देखते हुए।

रूस-चीन की बढ़ती दोस्ती को रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण देखा जा रहा है। लेकिन रूस-चीन के संबंध यूक्रेन युद्ध से बहुत पहले दिखने लगे थे। लेकिन यह युद्ध एक निर्णायक बिंदु था, जिसने इस मित्रता को प्रकट किया और गति बढ़ा दी। द प्रिंट में छपे एक लेख में बताया गया कि चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिनसे पुतिन ने पिछले दशक में 40 से ज्यादा बार मुलाकात की है। औसतन साल में चार बार से ज्यादा मुलाकात हुई। तब रूस और यूक्रेन का युद्ध भी नहीं शुरू हुआ था।

पड़ोसियों की जमीन कब्जा रहे रूस-चीन
शी जिनपिंग सत्ता में आने के बाद से ही चीन को एक विशाल साम्राज्य के रूप में स्थापित करने में लगे हैं। रूस और चीन में एक तरह की समानता है। वह यह कि दोनों ही पड़ोसियों की जमीन कब्जाने में लगे हैं। रूस ने 2014 में क्रीमिया पर कब्जा किया था। वहीं चीन ने अन्य संप्रभु राषट्रों की भूमि और समुद्री क्षेत्रों पर पूरी तरह से दावा करना शुरू कर दिया। रूस चीन ने मिलकर हाइड्रोकार्बन की बिक्री, हथियारों की बिक्री, दोहरे उपयोग वाली तकनीक, रूबल के लिए राजकोषीय समर्थन और युआन में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से जुड़े समझौते किए हैं।

क्या करे भारत?
भारत के साथ चीन का सीमा को लेकर विवाद है। रूस से भारत का ऐसा कोई विवाद नहीं है, लेकिन उसका उसके पड़ोसियों से झगड़ा है। इसे बनाए रखने के लिए उसे भारत की जगह चीन की जरूरत है। भारत को चीन और रूस के संबंधों पर नजर रखनी चाहिए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत को अपनी रक्षा साझेदारियों में विविधता लाकर रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करनी चाहिए। इसके अलावा एक्सपर्ट्स का कहना है कि राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाने के लिए घरेलू सुधारों की आवश्यक्ता है। इसमें कृषि और श्रम कानूनों में सुधार, विदेशी निवेश आकर्षित करना और व्यापार संबंध और टेक्नोलॉजी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

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