नई दिल्ली,
लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ही केंद्र की गद्दी हासिल करने के कवायद तेज हो चुकी है. इस चुनाव में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला है, लेकिन एनडीए 272 सीटों के जादुई आंकड़े को पार कर गया है. ऐसे में नरेंद्र मोदी एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए तैयार हैं, लेकिन बीजेपी और एनडीए को मजबूत जनादेश नहीं मिल पाने के कारण पार्टी और गठबंधन में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है. वहीं सरकार बनाने के जादुई आंकड़े से दूर विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक भी केंद्र में सरकार बनाने का दावा कर रहा है.
उधर, 272 से कम सीटों वाली बीजेपी के साथ, मोदी सरकार 3.0 पहले दो कार्यकालों (2014 और 2019) से काफी अलग होने की संभावना है. इस बार नरेंद्र मोदी को एनडीए के सहयोगी दलों की जरूरत है और इन सहयोगियों में शामिल नीतीश कुमार व चंद्रबाबू नायडू को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सोशल मीडिया से लेकर मीडिया में जोरों पर हैं. ऐसे में राजनीति के जानकारों और विश्लेषकों की मानें तो इस बार के चुनावों के नतीजों से पांच बड़ी बातें निकलकर सामने आई हैं. आइए जानते हैं उनके बारे में-
1. मतदान केंद्र की गोपनीयता में वोटर्स ने निडरता से अपनी बात रखी है. यह भारतीय लोकतंत्र की एक खूबसूरत जीत है, क्योंकि ईवीएम दबाकर वोटर्स ने पूरे राजनीतिक वर्ग को यह संदेश दिया कि वे डराने-धमकाने और नफरत की राजनीति नहीं चाहते.
2. दूसरी बात यह निकलकर सामने आई है कि कोई भी दल भारतीय वोटर्स को कभी हल्के में न लें. इसका उदाहरण है आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनावों में वाईएस जगनमोहन रेड्डी की करारी हार. उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी पार्टी को ऐसा जनादेश मिलेगा. वह आश्वस्त थे कि राज्य में विकास पर कम ध्यान देने वाली उनकी उदारता-केंद्रित सरकार उन्हें सत्ता में वापस लाने के लिए पर्याप्त है. लोगों को फ्रीबीज देकर वह सत्ता में काबिज रह सकते हैं. लेकिन स्थानीय स्तर के वाईएसआरसीपी नेताओं द्वारा डराने-धमकाने, भ्रष्टाचार और अहंकार के प्रति लोगों की नाराजगी ने जगनमोहन रेड्डी को बड़ा झटका दिया है.
3. किसी राजनेता को कभी भी हल्के में न लें. उदाहरण के लिए एन चंद्रबाबू नायडू से बेहतर कोई नहीं है, जिन्होंने पिछले पांच सालों में सत्ता से बाहर रहने, अपमान सहने और जेल में रहने के बाद भी शानदार तरीके से वापसी की. 1990 के दशक में आंध्र प्रदेश में ई-गवर्नेंस की शुरुआत करने वाले नायडू ने और भी ज़्यादा शक्तिशाली जनादेश के साथ वापसी की है. 2019 के विधानसभा चुनावों में सिर्फ 23 सीटों पर सिमटने पर नायडू का वाईएसआरसीपी (जगनमोहन रेड्डी की पार्टी) ने मजाक उड़ाया था. इतना ही नहीं, पिछले साल कौशल विकास मामले में उन्हें 53 दिनों के लिए जेल भी भेजा गया. 4 जून को आए विधानसभा चुनावों के नतीजों के प्रदर्शन ने दिखा दिया है कि वे कभी हार नहीं मानेंगे. पिछले पांच सालों में नायडू ने खुद को दिन प्रति दिन मजबूत किया और जब वे 13 मई के चुनाव में बॉक्सिंग रिंग में उतरे, तो उन्होंने अपने धुरंधर प्रतिद्विंदी वाईएस जगन मोहन रेड्डी को करारी शिकस्त दी. 2019 में 151 सीटें हासिल करने वाली वाईएसआरसीपी को शिकस्त देते हुए नायडू की पार्टी ने इस बार 175 सीटें जीती हैं.
4. केंद्र की नई एनडीए सरकार का रिमोट कंट्रोल इस बार अमरावती (आंध्र प्रदेश की राजधानी) और पटना (बिहार की राजधानी) में होगा. बीजेपी द्वारा 272 सीटों का जादुई आंकड़ा नहीं छू पाने के कारण इस बार नरेंद्र मोदी के एकतरफा नियंत्रण का अंत हो जाएगा. अब इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली को चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार से महत्वपूर्ण फैसलों पर एनओसी लेनी होगी, जिनके समर्थन के बिना एनडीए गठबंधन ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा.
5. मीडिया की चकाचौंध और सोशल मीडिया पर चर्चा से ही कोई नेता नहीं बनता. के अन्नामलाई और माधवी लता जैसे मीडिया के पसंदीदा नेताओं की हार इसका एक उदाहरण है. इस चुनाव में बीजेपी को न केवल अपने बयानों का बल्कि अपने कार्यकर्ताओं के प्रबंधन के तरीके का भी मूल्यांकन करना चाहिए.
