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Thursday, May 7, 2026
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चीन तय कर रहा भारत की चाल! क्या ड्रैगन बिना नहीं चलेगा स्मार्टफोन धंधा, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

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भारत दुनिया के टॉप स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग देश की लिस्ट में शामिल हो चुका है। हालांकि हकीकत यह है कि भारत चीनी स्मार्टफोन कंपनियों के दम पर स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग हब बना हुआ है। भारत में चाइनीज कंपनियां बड़े पैमाने पर स्मार्टफोन की मैन्युफैक्चरिंग करती है। साथ ही उन्हें दूसरे देशों को एक्सपोर्ट करती है। अगर भारत की बात करें, तो भारत की टॉप स्मार्टफोन कंपनी Vivo है, जो एक चाइनजी कंपनी है। साथ ही अगर टॉप 5 भारतीय स्मार्टफोन ब्रांड की बात की जाएं, तो उसे 3 से 4 ब्रांड आपको चाइनीज देखने को मिल जाएंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चीन भारत की बैसाखी बन गया है। क्या बिना ड्रैगन के भारतीय स्मार्टफोन मार्केट नहीं चल सकती है?

भारत को उठाना पड़ा नुकसान
केंद्रीय मंत्रालयों की रिपोर्ट की मानें, तो भारत को चीन के साथ तनाव का नुकसान उठाना पड़ा है। इससे भारत की स्मार्टफोन समेत इलेक्ट्रॉनिक्स मैनयूफैक्चिरिंग इंडस्ट्री को करीब 2 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक गुड्स के निर्यात के मोर्च पर भी नुकसान का सामना करना पड़ा है।

मैन्यूफैक्चरिंग के लिए चीन पर निर्भर भारत
भारतीय टेक इंडस्ट्री पूरी तरह से प्रोडक्ट निर्माण के लिए चीन पर निर्भर है। बता दें कि भारत में बनाए जाने वाले लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान के पार्ट को चीन से आयात किया जाता है। चीन से 89.8 बिलियन डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलिकॉम प्रोडक्ट को वित्त वर्ष 2024 में चीन से मंगाया गया है, जो कुल पार्ट्स आयात का करीब 44 फीसद है। साल 2007 से 2019 के दौरान इंटीग्रेटेड सर्किट का इंपोर्ट 166 मिलियन डॉलर है, जो साल 2020 और 2022 में बढञकर 4.2 बिलियन डॉलर हो गया है। इसी दौरान ट्रांजिस्टर और डायोड और सेमीकंडक्टर 133.3 मिलियन डॉलर से 2.3 बिलियन डॉलर हो गया है।

लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर जोर
मोबाइल पीएलआई स्कीम को साल 2020-21 में शुरू किया गया था, उस दौरान लोकल स्तर पर स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दिया गया था। ऐसे में उम्मीद थी कि चीन से प्रोडक्ट के साथ पार्ट सप्लाई में कमी होगी। हालांकि अभी भी चीन मैन्यूफैक्चिरिंग पार्ट्स का बड़ा सप्लायर बना हुआ है। हालांकि भारत सरकार लंबे वक्त से लोकल स्तर पर पार्ट्स की सप्लाई की योजना बना रही है। इसी योजना के तहत भारत में लोकल स्तर पर सेमीकंडक्टर की मैन्युफैक्चिरिंग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। साथ ही सरकार चाइनीज कंपनियों में भारतीय नागरिकों की तैनाती करने की तैयारी में है, जिससे भारत में चीन के दखल को कम किया जा सके। इसी रणनीति के तहत टाटा जैसी कंपनियां चाइनीज स्मार्टफोन ब्रांड वीवो में हिस्सेदारी खरीद रही हैं। साथ ही भारत सरकार स्मार्टफोन डिस्ट्रीब्यूशन में भी भारतीय कंपनियों को शामिल करना चाहती है।

भारत के सामने क्या हैं चुनौतियां?​
स्मार्टफोन समेत इलेक्ट्रॉनिक गुड्स मैन्युफैक्चिरिंग में चीन के मुकाबले यूरोपीय देशों से सामान मंगाना महंगा पड़ता है। साथ ही स्किल्ड इंजीनियरिंग के मामले में चीन सस्ता है। साधारण शब्दों में समझें, तो स्मार्टफोन या किसी अन्य प्रोडक्ट को बनाने के लिए भारी मशीनरी और इंजीनियरिंग लगती है। ऐसे में चीन से भारी मशीन और इंजीनियर सस्ते में आ जाते हैं। लेकिन भारत सरकार की ओर से चीनी नागरिकों को वीजा नहीं दिया जा रहा है। साथ ही चाइनीज इंजीनियर भारत आने से डर रहे हैं, क्योंकि चीन कंपनियां सरकार के जांच के दायरे में हैं। रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि अगर चीन के प्रति नरमी बरती जाती, तो भारत में चीन से आने वाला निवेश बढ़ सकता था, जिससे सरकार के साथ आम लोगों को फायदा होता।

क्या चीन बिना नहीं चल पाएगा काम
ऐसा नहीं है कि चीन के बिना भारत का काम नहीं चल सकता है। हालांकि अगर चीन के साथ मिलकर काम किया जाए, तो मैन्यूफैक्चिरिंग की रफ्तार को तेज किया जा सकता है। साथ ही रोजगार के मोर्च पर फायदा मिल सकता है। ऐसा इंडिया सेलुलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (ICEA) और मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (MAIT) की ओर से कहा जा रहा है।

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