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7 बच्चों को गर्भ में ही गंवाया… 8वें में डॉक्टरों ने कर दिया चमत्कार, AIIMS के दुर्लभ ब्लड ट्रांसफ्यूजन ने बचा ली जिंदगी

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नई दिल्ली

दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बेड पर एक महिला का इलाज चल रहा था। महिला की स्थिति काफी गंभीर थी। महिला के गर्भ में एक बच्चा पल रहा था था। महिला के शरीर से भ्रूण को निकालने के लिए तुरंत ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत थी। महिला की बॉडी में हीमोग्लोबिन का स्तर काफी गिर (6 g/dl)गया था। सामान्य रूप से महिला के शरीब में हीमोग्लोबिन का स्तर 12-15g/dl होता है। चिंता की बात यह थी कि इस महिला का इससे पहले सात बार मिसकैरिज हो चुका था। महिला 8वीं बार प्रेगनेंट हुई थी।

एम्स से मांगी गई मदद
मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने महिला की गंभीर स्थिति को देखते हुए एम्स, दिल्ली के ब्लड बैंक को फोन किया। यहां से एक रेयर ब्लड ग्रुप के खून की मांग की गई। एम्स ने देशभर के डोनर ग्रुप को चेक किया लेकिन उस ब्लड ग्रुप का खून नहीं मिला। इसके बाद मामला एम्स को रेफर किया गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार महिला के बार-बार गर्भ ही बच्चे की मौत हो जा रही थी। मां और अजन्मे बच्चे का ब्लड ग्रुप अलग-अलग था। ऐसे में, बच्चे के विकास की स्थिति मुश्किल थी। इसलिए, उसे सात अजन्मे बच्चों की मौत का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में 400 से अधिक ब्लड ग्रुप प्रचलित हैं। इस महिला का ब्लड ग्रुप डी — (डैश डैश) फेनोटाइप था जो बेहद दुर्लभ है।

एम्स ने बचाई 8वें शिशु की जान
एम्स में डॉक्टरों ने गर्भस्थ शिशु को बाहर निकालने के लिए इमरजेंसी प्रोसेस शुरू किया। जबकि मां का हीमोग्लोबिन अभी भी कम था। महिला इसी तरह की स्थिति में अपना सांतवा बच्चा गंवा चुकी थी। हालांकि, आठवीं बार जब गंभीर स्थित में एम्स पहुंची तब डॉक्टरों की टीम का प्रयास रंग लाया। डॉक्टरों ने गर्भ में पल रहे भ्रूण का सफलतापूर्वक ब्लड ट्रांसफ्यूजन कर दिया। एम्स में डॉ के अपर्णा शर्मा, डॉ वत्सला डधवाल, डॉ नीना मल्होत्रा, डॉ अनुभूति राणा और ट्रांसफ्यूजन हेड डॉ हेम चंद्र पांडे सहित मैटरनिटी और स्त्री रोग विभाग के चार से अधिक डॉक्टरों की एक टीम ने उसके आठवें बच्चे को सफलतापूर्वक बचाया। इस तरह डॉक्टरों ने इतिहास रच दिया।

क्यों खास थी ये सर्जरी
रिपोर्ट के अनुसार भ्रूण को जीवित रखने में मदद करने के लिए जापान से प्राप्त ओ डी – फेनोटाइप लाल रक्त कोशिका इकाइयों के सफल ट्रांसफ्यूजन के जरिये संभव हुआ। यह प्रक्रिया भारत में अपनी तरह की पहली और दुनिया में आठवीं सफल प्रक्रिया बताई जाती है। इन विशेष ब्लड यूनिट का यूज गर्भ के भीतर ट्रांसफ्यूजन के लिए किया गया था। यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसने मां से स्थानांतरित एंटीबॉडी के कारण हेमोलिसिस (लाल रक्त कोशिकाओं का विनाश) के कारण गंभीर एनीमिया से पीड़ित अजन्मे बच्चे के स्वास्थ्य और अस्तित्व को सुनिश्चित करने में मदद की। इस स्थिति को भ्रूण और नवजात शिशु की हेमोलिटिक बीमारी (एचडीएफएन) कहा जाता है।

डॉक्टरों के अनुसार, गर्भ के भीतर फ्यूजन में डोनर रेड ब्लड सेल्स को सीधे भ्रूण में इंजेक्ट किया जाता है। भ्रूण में एनीमिया के दो सामान्य कारण हैं- आरएच असंगति और मातृ पार्वोवायरस बी19 वायरल संक्रमण। एम्स में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की डॉ. के अपर्णा शर्मा ने बताया कि आरएच असंगति तब उत्पन्न होती है जब मां और भ्रूण के रक्त समूह अलग-अलग होते हैं। इस विशेष मामले में, मां के रक्त में एंटी-आरएच17 एंटीबॉडी थे, जिन्होंने भ्रूण की रक्त कोशिकाओं पर हमला किया और उन्हें नष्ट कर दिया। इससे भ्रूण की रेड ब्लड सेल्स की संख्या में भारी कमी आई। इससे आगे की जटिलताओं को रोकने के लिए गर्भ के भीतर ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ी।

ब्लड ट्रांसफ्यूजन क्या होता है?
ब्लड ट्रांसफ्यूजन को सामान्य शब्दों में खून चढ़ाना कहते हैं। ब्लड ट्रांसफ्यूजन में एक नस के जरिये शरीर में रक्त चढ़ाया जाता है। शरीर की जरूरत के आधार पर डॉक्टर रेड ब्लड सेल्स, वाइट ब्लड सेल्स, प्लेटलेट्स या क्लॉटिंग के कारकों को देखते हुए प्लाज्मा या पूरा खून चढ़ाने का फैसला करते हैं। सामान्य रूप से किसी बीमारी या दुर्घटना में घायल होने पर अधिक खून बह जाने की वजह से इसकी जरूरत पड़ती है। इसके अलावा ब्लड में मौजूद किसी घटक की कमी के कारण भी ब्लड चढ़ाना की जरूरत पड़ती है।

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