नई दिल्ली,
पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से में होने वाली हलचल से महाद्वीपों के बीच के हिस्से में ऊंचे पठार बनते हैं. जब महाद्वीप टूटते हैं, तो उनके किनारों पर बड़ी-बड़ी चट्टानें उठती हैं. यह टूटना पृथ्वी के भीतर एक लहर पैदा करता है जो धीरे-धीरे अंदर की ओर चलती हैं. पठारों को ऊपर उठाती हैं.
इंग्लैंड के साउथहैम्प्टन यूनिवर्सिटी के जियोसाइंटिस्ट थॉमस जरनॉन कहते हैं कि वैज्ञानिकों को पता है कि महाद्वीपीय दरारें विशाल चट्टानों को उठाती हैं, जैसे कि पूर्वी अफ़्रीकी रिफ्ट वैली और इथियोपियाई पठार को अलग करने वाली खाईं दीवारें. ये खड़ी चट्टानें अक्सर महाद्वीपों के मजबूत और स्थिर केंद्रों से उठने वाले आंतरिक पठारों को घेरती हैं.
लेकिन ये दोनों ही लैंडस्केप फीचर्स आमतौर पर 1 से 10 करोड़ साल के अंतर पर बनती हैं. इसलिए कई वैज्ञानिकों का मानना है कि इनका निर्माण अलग-अलग हुआ है. जिन्हें अलग-अलग प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ा है. यह नई स्टडी 7 अगस्त 2024 में Nature जर्नल में प्रकाशित हुई है.
भारत का पश्चिमी घाट भी इसी लहर की वजह से बना है
जरनॉन ने इसकी स्टडी के लिए धरती के आखिरी सुपरकॉन्टीनेंट के टूटने के बाद बनी खाईं दीवार की जांच पड़ताल की. इनमें से एक दीवार भारत में है. जिसे पश्चिमी घाट (Western Ghats) कहते हैं. यह 2000 किलोमीटर लंबी है. ब्राजील में हाईलैंड प्लैट्यू जो 3000 किलोमीटर लंबी है. दक्षिण अफ्रीका में सेंट्रल प्लैट्यू. यह 6000 किलोमीटर लंबी है. यानी इन पठारों के नीचे के हिस्से कई किलोमीटर ऊपर उठे हैं. जिसके पीछे मैंटल में चली लहर है.
हर 10 लाख साल में 15 से 20 किलोमीटर बढ़ते हैं पठार
जब जरनॉन की टीम ने टोपोग्राफिक नक्शों से इन जगहों का मिलान किया तो पता चला कि ये महाद्वीपों के ऊपर उठते समय अलग होने की वजह से बने हैं. क्योंकि ऊपर उठने वाले महाद्वीपों से मैंटल में डिस्टर्बेंस होती है. इसकी वजह से तेज लहरे उठती हैं. ये लहरें मैंटल में अंदर दौड़ती हैं. इनकी वजह से ही ये पठार ऊपर उठते हैं. लेकिन बहुत धीमी गति से. हर दस लाख साल में ये 15 से 20 किलोमीटर बढ़ते हैं. इनकी वजह से पठारों का आकार बदलता रहता है.
