नई दिल्ली
कोलकाता के आरजी कर अस्पतास में ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुए रेप-मर्डर और बदलापुर को लेकर देशभर में प्रदर्शन जारी हैं। इस घटना को लेकर राजनीति भी जमकर हुई। बीजेपी इस मुद्दे को लेकर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को घेर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले से रेप जैसी घटनाओं पर सख्त कानून बनाने की बात कही। वहीं सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने भी इस मामले में सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी की। इस सबके बीच अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। इस मामले में उन्होंने सख्ती के साथ कहा, ‘अब बहुत हो गया।’ राष्ट्रपति के रूप में यह उनका अब तक का सबसे सख्त बयान है। इससे पहले किसी भी राष्ट्रपति ने इस तरह से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी। राष्ट्रपति के तीखी प्रतिक्रिया से उम्मीद जताई जा रही है कि देश में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कोई सख्त कानून बन सकता है।
राष्ट्रपति के बयान से जगी उम्मीद
कोलकाता मामले को लेकर छात्र सड़क पर प्रदर्शन कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री को पत्र लिख रही हैं। बीजेपी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर मामले में कार्रवाई करने में विफल रहने का आरोप लगा रही है। तो वहीं सत्ताधारी टीएमसी ने बीजेपी पर इस घटना का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है। इस घटना के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में घमासान मचा हुआ है। अन्य विपक्षी दलों का भी कुछ ऐसा ही रुख है। कुल जमा बात ये है कि सभी राजनीतिक दल और नेता तू-तू-मैं-मैं का खेल रहे हैं। इस बीच राष्ट्रपति का ऐसा बयान आना काफी जरूरी माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि वह इस मुद्दे पर सरकारों को जवाबदेह ठहराना चाहती हैं। यह भी स्पष्ट है कि राष्ट्रपति महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को लेकर चिंतित हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों को भी दिया संकेत
राष्ट्रपति के इस बयान को केंद्र और सरकारों के लिए एक गंभीर आलोचना मानी जा रही है। इसे देश के प्रथम नागरिक द्वारा सरकारों को अपराधियों को सलाखों के पीछे डालने और कानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए एक फटकार के तौर पर देखा जा रहा है। राष्ट्रपति के रुख से दोनों सरकारों को अलग-अलग संकेत मिला है। इस मामले में ममता बनर्जी को बतौर मुख्यमंत्री यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दोषियों को बचाया न जाए और केंद्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस मामले की जांच कर रही सीबीआई निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से जांच करे और राज्य सरकार को अपनी जांच के बारे में बताती रहे।
ध्रुवीकरण की राजनीति में उठ रहे कई सवाल
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में कहा कि ध्रुवीकरण की राजनीति में, कुछ और सवाल भी उठते हैं। क्या पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की वकालत की जा रही थी, खासकर जब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री से मिलने आए थे? कुछ अन्य लोगों ने मणिपुर में हमले के वीभत्स मामलों पर चुप्पी पर सवाल उठाए। ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से मात देने में नाकाम रहने के बाद, बीजेपी में कई लोग पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन के बारे में सोच सकते हैं, क्योंकि अब “दीदी” बैकफुट पर दिखाई दे रही हैं। केंद्रीय शासन तभी लागू किया जा सकता है जब संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए, केवल कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर समस्याएं होने के कारण संवैधानिक रूप से चुनी हुई सरकार को नहीं हटाया जा सकता है। फिलहाल पश्चिम बंगाल में अशांति का जोखिम उठाना राजनीतिक रूप से भी खतरनाक होगा। अपनी सीमाओं पर एक अशांत बांग्लादेश के साथ, इसके भारत के पूर्वी और उत्तरपूर्वी हिस्सों के लिए प्रभाव हो सकते हैं।
एक-दूसरे पर हमला करते रहते हैं राजनीतिक दल
कोलकाता घटना पर राजनीतिक अवसर को भांपते हुए, राजनीतिक दल इसका इस्तेमाल एक-दूसरे पर हमला करने के लिए कर रहे हैं। जबकि इस तरह के मुद्दों पर सभी राजनीतिक दलों को एक साथ आना चाहिए ताकि अपराधियों को कठोर सजा मिले और न्याय सुनिश्चित हो सके। लेकिन देश में ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक आक्रोश भी चुनिंदा रूप से व्यक्त किया जाता है। 2020 में जब हाथरस में एक दलित महिला के साथ गैंगरेप और मर्डर हुआ था, अधिकारियों ने उसके परिवार को बिना बताए रात के अंधेरे में उसका अंतिम संस्कार कर दिया। इस घटना पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने मोर्चा संभाला और हाथरस की यात्रा की। हालांकि उन्होंने कोलकाता में डॉक्टर के साथ हुए रेप-मर्जर की निंदा तो की है, लेकिन उनमें से कोई भी अभी तक कोलकाता नहीं गया है, जिसे कांग्रेस के विरोधी केवल दिखावा मानते हैं। बाद में राहुल ने जो हुआ उसके लिए प्रशासनिक चूक को जिम्मेदार ठहराते हुए टीएमसी के गुस्से को भड़का दिया।
विपक्षियों का हमला करना गलत नहीं, लेकिन…
इसका मतलब यह नहीं है कि संसदीय लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है। अगर भाजपा ने कोलकाता की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों का समर्थन नहीं किया होता, तो यह एक विपक्षी दल के रूप में अपने अस्तित्व को साबित नहीं कर पाती। अगर विपक्षी दलों ने बिलकिस बानो के साथ बलात्कार और उसके परिवार के सदस्यों की हत्या के दोषी 11 लोगों की रिहाई की निंदा नहीं की होती तो शायद सुप्रीम कोर्ट दोषियों की रिहाई रद्द नहीं करती। लेकिन एक समय ऐसा आता है जब राजनीतिक दलों को ‘लक्ष्मण रेखा’ खींचनी पड़ती है और यह तेजी से गायब होती जा रही है। कोलकाता मामले में नाराज जनता और एक राजनीतिक वर्ग की पहली मांग मृत्युदंड थी। ममता बनर्जी और अन्य ने बलात्कार विरोधी कानून को मजबूत करने और बलात्कारी के लिए मृत्युदंड की मांग की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुझाव दिया है कि बलात्कारियों को दी जाने वाली सजा को उतना ही प्रचारित किया जाना चाहिए जितना कि मामले को ही, ताकि यह एक निवारक बने।
सरकार की कल्पना और इच्छाशक्ति दोनों में कमी
भारत में शायद किसी भी लोकतांत्रिक देश के मुकाबले सबसे सख्त रेप के खिलाफ कानून हैं। 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया मामले और न्यायमूर्ति वर्मा आयोग के गठन के बाद, निर्भया हेल्पलाइन (112) और साथ ही निर्भया फंड की स्थापना की गई। अफसोस की बात है कि 10 साल बाद भी, आधे से भी कम फंड का उपयोग किया गया, जो सत्ता में बैठे लोगों की कल्पना और इच्छाशक्ति दोनों की कमी को दर्शाता है। राष्ट्रपति मुर्मू का राष्ट्रपति चुना जाना देश की हर आदिवासी लड़की को यह एहसास कराता होगा कि वह भी यह मुकाम हासिल कर सकती है। इसने कई लोगों को गौरवान्वित महसूस कराया कि आखिरकार भारत की परिधि से एक आदिवासी महिला भारतीय राज्य और उसके सशस्त्र बलों का नेतृत्व कर रही है। अब उनकी कड़ी टिप्पणी को देखते हुए, सभी की निगाहें राष्ट्रपति मुर्मू पर टिकी होंगी। मानसिकता में बदलाव लाने के लिए वह क्या कदम उठाती हैं, जिसके बारे में उन्होंने भावुक होकर बात की थी। क्या वह संवैधानिक लक्ष्मण रेखाओं को तोड़े बिना व्यवस्था को नया रूप दे सकती हैं जो उनकी शक्तियों का परिसीमन करती हैं तो वह उन लोगों को प्रोत्साहित कर सकती हैं जो पहले से ही लड़ाई लड़ रहे हैं।
