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मृत्युदंड का समय पर अमल नहीं होने से न्याय प्रणाली हो सकती है प्रभावित: सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली,

सुप्रीम कोर्ट से सजा-ए-मौत का फैसला होने के बाद भी वर्षों तक इस पर अमल यानी फांसी ना लगाए जाने पर पीठ ने असंतोष और चिंता जताई है. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय एस ओक, जस्टिस अहदानुद्दीन अमानुल्ला और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने ऐसे ही एक मामले पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया.

पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि मृत्युदंड की सजा देने में कानूनी प्रक्रिया की आड़ में अनिश्चितकालीन देरी से मृत्युदंड के दोषी और पूरी न्याय प्रणाली पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है. ऐसा अक्सर दया याचिकाओं के समयबद्ध निपटारे की गाइडलाइंस के अभाव में हो रहा है.

कोर्ट ने कही अहम बात
सुनवाई के दौरान तीन जजों की पीठ ने कहा कि इस तरह की देरी को अक्सर किसी के सिर पर लटकी तलवार के समान समझा जाता है. क्योंकि जब तक आपकी मौत की सजा पर अमल नहीं होता तब तक आपके सिर पर ये तलवार लटकी ही रहेगी. मन में खटका रहता है कि यह लटकती तलवार आपके सिर पर कभी भी गिर सकती है.

पीठ ने महाराष्ट्र सरकार बनाम प्रदीप यशवंत कोकड़े के मुकदमे में सुनवाई करते हुए कहा कि अक्सर इस तरह की देरी, इस बात पर स्पष्टता की कमी के कारण भी होती है कि सत्र न्यायालय को उन मामलों में क्या प्रक्रिया अपनानी चाहिए. जहां मृत्युदंड की पुष्टि हाईकोर्ट ने तो की है लेकिन दोषी ने दया याचिका दायर की हुई है.

कोर्ट ने पूछा कि मान लीजिए सर्वोच्च न्यायालय से रिट प्राप्त करने के तुरंत बाद सत्र अदालत मृत्यु दण्ड पर अमल का वारंट जारी कर देती है क्योंकि दोषी की प्रत्येक याचिका खारिज हो जाती है, तो तब तक राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल कर दी जाती है. यानी दया याचिका लंबित होने के बावजूद वे वारंट जारी कर देते हैं. दया याचिका लंबित होने पर सत्र न्यायालय के लिए क्या प्रक्रिया है? इसे स्पष्ट करने की जरूरत है.

महाराष्ट्र के मामले की सुनवाई कर रही थी अदालत
इस अंतर को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता/सीआरपीसी की धारा 413 और 414 (और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता/बीएनएसएस की धारा 453 और 454 के तहत संबंधित प्रावधान) को पूर्ण प्रभाव देने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का सुझाव दिया है. ये सत्र न्यायालय द्वारा मृत्युदंड के आदेशों को लागू करने से संबंधित होगा.

सुप्रीम कोर्ट की ये पीठ महाराष्ट्र सरकार की 2019 में दाखिल आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही थी. राज्य ने 2007 में पुणे बीपीओ कर्मचारी के बलात्कार और हत्या के लिए दोषी ठहराए गए दो लोगों, पुरुषोत्तम बोराटे और प्रदीप कोकड़े को दी गई मौत की सज़ा को कम करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी थी.

हाईकोर्ट ने इस विचार से सज़ा कम कर दी कि मौत की सज़ा के निष्पादन में काफ़ी देरी हुई है. इस देरी में दोषियों ने राज्यपाल को भेजी दया याचिकाओं पर निर्णय लेने में लगने वाला लगभग 1-2 साल का समय भी शामिल है. इसके बाद हाईकोर्ट ने दो दोषियों को दी गई सजा-ए-मौत को उम्रकैद में बदल दिया. इसमें प्रत्येक को जेल में कम से कम 35 साल काटने होंगे.

इस अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य से पूछा कि वह इस बात पर ज़ोर क्यों दे रहा है कि दोषियों को काफ़ी देरी के बावजूद फांसी पर लटकाया जाए? सुनवाई के दौरान दलील दी गई कि इस मामले में मृत्युदंड पर अमल में हुई देरी सिर्फ प्रशासनिक वजहों से नहीं बल्कि न्यायिक और प्रक्रियागत वजहों से भी हुई है. क्योंकि यह बताया गया कि राज्यपाल के यहां से दया याचिका खारिज किए जाने के बाद भी मृत्युदंड की सजा पाए दोषियों को वर्षों तक यह अनिश्चितता बनी रही कि उन्हें मृत्युदंड कब दिया जाए.

प्रक्रिया तय करने पर दी जोर
दोषियों के वकील ने तर्क दिया कि यह देरी असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन करती है. कोर्ट ने पाया कि दया याचिका खारिज होने के बारे में सत्र न्यायालय को सक्रिय रूप से सूचित न किए जाने के कारण मृत्युदंड के निष्पादन में और देरी हो सकती है. पीठ ने कहा कि ये सभी देरी न सिर्फ दोषी बल्कि पीड़ितों के अधिकारों का भी उल्लंघन है. इस मामले ने प्रणाली और प्रक्रिया की खामियां सामने रख दी हैं.

इससे न्यायालय को इस बात पर विचार करना पड़ा कि क्या मृत्युदंड पर अमल में अनिश्चितकालीन देरी न हो. यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ दिशा-निर्देश बनाए जाने चाहिए. जैसे जस्टिस ओका ने कहा, ‘संभवतः अब हमें प्रक्रिया तय करनी होगी. वो इस बारे में होगी कि मृत्युदंड के विरुद्ध दोषी की दया याचिका खारिज होने पर सरकारी अभियोजक को कब, कैसे क्या करना होगा. यह इस तरह नहीं हो सकता जैसे ही रहा है. अभियोजक और न्यायालय को कैसे प्रतिक्रिया करनी है इसके लिए प्रक्रिया होनी चाहिए.’पीठ ने कहा कि राज्यपाल के दया याचिका खारिज करने के बाद राज्य को मृत्युदंड के निष्पादन के लिए सत्र न्यायालय से संपर्क करने में सक्रियता से आगे बढ़ना चाहिए.

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