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Tuesday, April 7, 2026
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‘सोशल मीडिया का दौर है, पूर्वाग्रह दूर रखिए…’, ‘पाकिस्तान’ टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने जज की खूब लगाई क्लास

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नई दिल्ली

विवाद था मकान-मालिक और किरायेदार के विवाद का। कर्नाटक हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस वेदव्यासचार श्रीशानंद ने सुनवाई के दौरान बेंगलुरु के ‘मुस्लिम बहुल’ इलाके को पाकिस्तान बता दिया। टिप्पणी का सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही संज्ञान ले लिया। फिर जज साहब को माफी मांगनी पड़ी और अब आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कार्यवाही को बंद कर दिया। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने बुधवार को टिप्पणी की कि देश के किसी भी हिस्से को पाकिस्तान नहीं कहा जा सकता, ये देश की अखंडता के खिलाफ है।

चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की 5 जजों की बेंच ने जजों और वकीलों को चेतावनी दी कि उन्हें अपने पदों का निर्वहन करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह न झलकें। कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महिला वकील से भी आपत्तिजनक भाषा में बात की थी।

बेंच ने कहा, ‘हम भारत के किसी भी हिस्से को पाकिस्तान नहीं कह सकते क्योंकि यह मूल रूप से देश की अखंडता के खिलाफ है।’ हालांकि, हाई कोर्ट के जज द्वारा अपने बयान के लिए माफी मांगने के बाद शीर्ष अदालत ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई कार्यवाही को बंद कर दिया

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘यह लापरवाह टिप्पणी व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को दर्शाती है, खासकर तब जब इसे एक निश्चित लिंग या समुदाय के लिए निर्देशित माना जाता है। इसलिए पितृसत्तात्मक या महिलाओं के प्रति नकारात्मक टिप्पणी करने से बचना चाहिए। हम एक निश्चित लिंग या समुदाय पर की गई टिप्पणियों के बारे में अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं और ऐसी टिप्पणियों को नकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए।’

अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया के युग में, जजों द्वारा की गई कोई भी टिप्पणी का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, और इसलिए जजों को अपने पूर्वाग्रहों के बारे में पता होना चाहिए ताकि वे निष्पक्ष रूप से न्याय दे सकें।

अदालत ने कहा, ‘सोशल मीडिया के प्रसार और पहुंच ने अदालती कार्यवाही की व्यापक रिपोर्टिंग को शामिल किया है। देश के अधिकांश उच्च न्यायालयों ने अब लाइव-स्ट्रीमिंग या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के संचालन के नियमों को अपनाया है जो कोरोना महामारी के दौरान एक जरूरत के रूप में उभरा… सभी पक्षों, न्यायाधीशों, वकीलों, वादियों को यह पता होना चाहिए कि कार्यवाही उन दर्शकों तक पहुंचती है जो अदालत की भौतिक सीमा से बहुत दूर हैं और इस तरह सभी को समुदाय पर टिप्पणियों के व्यापक प्रभाव के बारे में पता होना चाहिए। जज के रूप में हम इस तथ्य के प्रति सचेत हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के पास जीवन के शुरुआती या बाद के अनुभवों के आधार पर पूर्वाग्रहों का एक समूह होता है। यह महत्वपूर्ण है कि एक जज अपने खुद के पूर्वाग्रहों से वाकिफ हो, और एक जज का हृदय और आत्मा तभी होती है जब वे निष्पक्ष होते हैं और तभी हम उद्देश्यपूर्ण न्याय दे सकते हैं।’

कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस श्रीशानंद क 2 वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए थे। एक वीडियो में वह पश्चिम बेंगलुरु के एक मुस्लिम बहुल इलाके को ‘पाकिस्तान’ कहते हुए दिखाई दे रहे थे। एक दूसरे वीडियो में वह विपरीत पक्ष के वकील से पूछे गए एक सवाल का जवाब देने के लिए एक महिला वकील को फटकार लगाते नजर आ रहे थे। जज महिला वकील से मजाक में कहते हुए दिखाई दे रहे थे कि ऐसा लगता है कि उन्हें विपरीत पक्ष के बारे में बहुत कुछ पता है, और वह अगली बार उनके अंडरगारमेंट्स का रंग भी बता सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जज की तरफ से की गईं इन टिप्पणियों का स्वतः संज्ञान लिया था और कर्नाटक हाई कोर्ट से इस पर एक रिपोर्ट मांगी थी। शीर्ष अदालत के संज्ञान लेने के बाद जज ने माफी मांग ली।

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