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Tuesday, March 31, 2026
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देश में हाई कोर्ट जजों के कितने पद खाली? दक्षिण राज्यों में स्थिति क्यों है बेहतर, समझ लीजिए

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नई दिल्ली

ऐसा क्यों है कि दक्षिणी राज्यों के हाई कोर्ट में जजों के खाली पद को उनकी स्वीकृत क्षमता के 4% तक कम करने में कामयाबी हासिल की है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में हाई कोर्ट में यह 49% तक है? हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के विश्लेषण से पता चलता है कि दक्षिणी राज्यों की संवैधानिक अदालतों ने अन्य राज्यों के समकक्षों के मुकाबले जजों की बड़ी संख्या में स्थायी खाली पदों के ट्रेंड को पलट दिया है।

उदाहरण के लिए, केरल हाई कोर्ट ने 1 नवंबर तक जजों के खाली पदों को 4% तक कम करने में कामयाबी हासिल की है, जो सभी बड़े हाई कोर्ट में सबसे कम है। मद्रास हाई कोर्ट जैसे क्षेत्र के अन्य हाई कोर्ट ने इसे 11% और कर्नाटक हाई कोर्ट ने 19% तक कम किया है।

सबसे अधिक खाली पद वाला हाई कोर्ट
इसके उलट, देश के सबसे बड़े हाई कोर्ट में शामिल इलाहाबाद हाई कोर्ट में जजों के 49% पद खाली हैं। यह सभी 25 हाई कोर्ट में सबसे अधिक है। अन्य जगहों पर भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। जहां उड़ीसा HC में 42% पद खाली हैं, वहीं उसके बाद कलकत्ता में 40%, पंजाब और हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में 38%-38% और बॉम्बे में 27% पद खाली हैं।

आखिर समस्या की जड़ क्या है?
जजों के खाली पदों का मुद्दा उच्च न्यायपालिका और सरकार दोनों के लिए एक लंबे समय से चली आ रही समस्या है। उपयुक्त उम्मीदवार न मिलने के लिए अक्सर जो कारण बताए जाते हैं, उनमें से एक यह है कि प्रसिद्ध वकील बेंच में शामिल होने के लिए तैयार नहीं होते हैं, क्योंकि उन्हें काम के बदल मिलने वाली सैलरी का अनुपात ठीक नहीं लगता है। दूसरा कारक, जो संभवतः यह बताता है कि दक्षिणी राज्यों के हाई कोर्ट में खाली पदों को काफी हद तक कम करने में सफल रहे हैं, वह है जजों की नियुक्ति के संबंध में कॉलेजियम की तरफ से समय पर सिफारिशें करना।

जज नियुक्ति की समय सीमा
नियमों के अनुसार, संबंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को वैकेंसी होने से कम से कम छह महीने पहले हाई कोर्ट के जज के रूप में किसी एडवोकेट या डिस्ट्रिक्ट जज में से किसी को प्रोमोट करने का प्रस्ताव शुरू करना होता है। हालांकि, इस समयसीमा का शायद ही कभी पालन किया जाता है। यह बात कानून मंत्री ने पिछले मानसून सत्र के दौरान संसद के एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कही थी।

कानून मंत्री ने आगे कहा था कि 19 जुलाई तक सरकार को केवल 219 सिफारिशें प्राप्त हुई थीं। यह प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में थीं, जबकि 357 जजों के पद खाली थे। शेष 138 खाली पदों के लिए संबंधित हाई कोर्ट के कॉलेजियम की तरफ से कोई सिफारिश नहीं की गई।

कैसे होती है जजों की अंतिम नियुक्ति
हालांकि संबंधित हाई कोर्ट के तीन सीनियर मोस्ट जज के कॉलेजियम की तरफ से सिफारिशें की जाती हैं, लेकिन अंतिम नियुक्ति आईबी की तरफ से स्वतंत्र जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की मंजूरी से की जाती है। 1 नवंबर तक देश के 25 हाई कोर्ट में जजों के 352 पद रिक्त थे, जो उनकी स्वीकृत संख्या 1,114 का 32% है।

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