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Tuesday, March 31, 2026
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बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांग रहे माता-पिता को डीवाई चंद्रचूड़ ने दी राहत, यूपी सरकार को दिया ये आदेश

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नई दिल्ली,

भारत के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने आखिरी वर्किंग डे पर बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांग रहे माता-पिता को बड़ी राहत दी है. उन्होंने यूपी सरकार से मामले में हस्तक्षेप करने और इलाज की व्यवस्था करने को कहा है. दरअसल, 30 वर्षीय हरीश पिछले 13 साल से कोमा (वेजिटेटिव स्टेट) में हैं. उनके इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ मां-बाप ने बेटे की इच्छामृत्यु के लिए याचिका दायर की थी. जिसमें उन्होंने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति देने की मांग की थी, ताकि वे अपने बेटे के जीवन समर्थन उपायों को हटाकर उसे प्राकृतिक मौत की ओर बढ़ने दे सकें. पैसिव यूथेनेशिया में लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटा दिया जाता है और इससे व्यक्ति की मौत हो जाती है.

आखिरी दिन चंद्रचूड़ ने की पहल
डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने अंतिम कार्यदिवस पर हस्तक्षेप किया और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वे हरीश राणा की देखभाल के लिए चल रहे चिकित्सा खर्चों को पूरा करने के उपायों पर विचार करें, क्योंकि उनके माता-पिता अपने बेटे की देखभाल के लिए सक्षम नहीं थे. दरअसल, राणा के माता-पिता, आशोक राणा (62) और निर्मला देवी (55), को लंबे समय से अपने बेटे की देखभाल में आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. हरीश राणा को सिर में गंभीर चोट लगी थी जब वह मोहाली में पढ़ाई के दौरान चौथी मंजिल से गिर गए थे.

अपने अंतिम सुनवाई में, चंद्रचूड़ ने केंद्र से एक स्थिति रिपोर्ट का निरीक्षण किया, जिसमें व्यापक देखभाल उपायों का विवरण दिया गया था. रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि राणा के घर पर देखभाल की व्यवस्था की जाएगी, जिसमें एक फिजियोथेरेपिस्ट और आहार विशेषज्ञ नियमित रूप से दौरा करेंगे, साथ ही एक ऑन-कॉल मेडिकल अधिकारी और नर्सिंग सहायता भी उपलब्ध होगी.

इसके अलावा सभी जरूरी दवाइयां और चिकित्सा आपूर्ति राज्य सरकार द्वारा मुफ्त में दी जाएगी. आशोक राणा और निर्मला देवी के वकील मनीष ने बेंच को सूचित किया कि परिवार ने सरकार की देखभाल योजना को स्वीकार कर लिया है और अब अपनी याचिका वापस ले रहे हैं.

इससे पहले, दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, ‘किसी को भी यहां तक कि डॉक्टर्स को भी किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनने की अनुमति नहीं है, चाहे उसका उद्देश्य दर्द और पीड़ा को राहत देना हो.’ 2018 में, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय ने यह स्पष्ट किया था कि व्यक्तियों को जीवन-रक्षक उपचार से इनकार करने का अधिकार है. बता दें कि पैसिव यूथेनेशिया केवल तब लागू होता है जब रोगी या उनके परिवार जीवन समर्थन उपायों को हटाने का निर्णय लेते हैं.

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