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महाराष्ट्र : एकनाथ शिंदे का ‘डिमोशन’ शिवसेना की चुनौतियों को कितना मुश्किल बनाएगा?

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नई दिल्ली,

शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे, जिन्हें पिछले ढाई वर्षों तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभालने के बाद अब डिप्टी सीएम के रूप में काम करना होगा. जाहिर है कि डिप्टी सीएम का पद मजबूरी में ही उन्होंने स्वीकार किया है. यह फैसला शिंदे के लिए एक कड़वी गोली निगलने जैसा ही रहा होगा. हालांकि डिप्टी सीएम बन जाने से शिंदे इतना परेशान नहीं होंगे जितना परेशान इस बात से होंगे कि अब भविष्य में उनके साथ क्या होगा. क्योंकि वो जानते हैं कि सीएम न रहने के बाद पार्टी में उनकी वो पकड़ नहीं रह जाएगी जो पहले रहा करती थी. दूसरे बीजेपी धीरे-धीरे उन्हें और उनकी पार्टी को निगलने का प्रयास करेगी ही. क्योंकि राजनीति ताकत के लिए ही की जाती है और यह बंदूक की नली से ही निकल कर आती है. शतरंज की एक गोटी के कमजोर होते ही पूरे महल के बिखरने का खतरा रहता है. हर पार्टी , हर नेता इसी संघर्ष को जीवन बना लेता है. हालांकि शिवसेना और बीजेपी के बीच सत्ता-साझेदारी के फॉर्मूले और मंत्रालयों के वितरण को लेकर कड़े मोलभाव हुए हैं. फिर भी शिंदे का असली संघर्ष अब शुरू होता है.

1- बेहतर प्रदर्शन की टीस को कंट्रोल करना होगा
लोकसभा चुनाव में शिवसेना ने बीजेपी से बेहतर प्रदर्शन किया था. महायुति को केवल 17 सीटें मिलीं, जो MVA की 30 सीटों के मुकाबले बहुत कम थीं. लेकिन शिवसेना ने 15 में से 7 सीटें जीतकर बीजेपी से बेहतर स्ट्राइक रेट दिखाया था. इसी तरह विधानसभा चुनावों में शिवसेना 57 सीटों के साथ विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी. यही कारण रहा कि शिंदे की उम्मीदों को पर लग गए थे. उन्हें उम्मीद जग गई थी कि वे मुख्यमंत्री पद पर फिर से वापस लौट सकते हैं.लेकिन बीजेपी ने ऐतिहासिक 132 सीटें जीतकर उनके इस सपने को खत्म कर दिया. खराब प्रदर्शन के बाद जब डिमोशन होता है तो उसे व्यक्ति पचा लेता है पर बेहतर प्रदर्शन के बाद जब रिवॉर्ड नहीं मिलता तो लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं. आए दिन जब जब उसकी टीस उठेगी तो महायुति में कलह बढ़ेगी. एकनाथ शिंदे को इसी टीस पर कंट्रोल करना होगा.

2- पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखना
एकनाथ शिंदे के लिए आज की स्थिति जून 2022 के ठीक विपरीत है. जब शिंदे ने बगावत करके उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी से 40 विधायकों को अलग कर लिया था. महा विकास अघाड़ी (MVA) सरकार को गिरा कर उन्होंने महायुति को सत्ता में लाया. यह तभी संभव हो पाया जब बीजेपी नेतृत्व ने शिवसेना की यह मांग मानी कि शिंदे मुख्यमंत्री बनेंगे, और फडणवीस को डिप्टी सीएम बनने के लिए राजी किया. हालांकि कहा यह भी जाता है कि शिंदे तो डिप्टी सीएम बनने को तैयार थे.

बीजेपी ने रणनीति के तहत एकनाथ शिंदे को सीएम बनाया ताकि महाराष्ट्र में लोग बीजेपी के प्रति यह नजरिया न बना लें कि केवल सत्ता के लिए बीजेपी ने शिवसेना को तोड़ दिया. यह फैसला तब हुआ था जब विधानसभा में बीजेपी 105 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी. पर अब परिस्थितियां अलग हैं. महाराष्ट्र में बीजेपी के पास बहुमत के करीब है.अगर शिंदे जरा भी असहयोग करते हैं या यस मैन से अधिक बनने की कोशिश करते हैं तो बीजेपी एक बार फिर शिवसेना में सर्जिकल स्ट्राइक कर सकती है. शिंदे सेना में वैसे भी कई विधायक ऐसे हैं जो बीजेपी के नेता रहे है और उन्हीं के कृपा से उन्हें शिवसेना का टिकट मिला था. यही नहीं चूंकि अब एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री नहीं हैं तो उनकी पार्टी के विधायकों की स्वामीभक्ति भी बदल सकती है. क्योंकि विधायक सत्ता की ताकत और पावर के लिए ही पार्टी तोड़कर उनके साथ आए थे.

3- उद्धव ठाकरे फिर से शिवसेना की विरासत पर फिर कब्जा न कर लें
आज से ढाई साल पहले अविभाजित शिवसेना को तोड़कर 40 विधायकों के साथ महायुति गठबंधन में शामिल हुए एकनाथ शिंदे ने बड़ी मेहनत से बाला साहब की विरासत को हासिल किया था. उद्धव ठाकरे के पास अब मौका है कि शिवसैनिकों को यह समझाने का एकनाथ शिंदे ने बीजेपी के बहकावे में आकर पार्टी को तोड़ दिया. शिवसैनिकों का असली घर उद्धव सेना ही है. जैसी परिस्थितियां बन रही हैं उसे देखकर लगता है कि शिवसेना यूबीटी अब कांग्रेस और एनसीपी (एसपी) का साथ छोड़कर अकेले महाराष्ट्र की राजनीति करे. अगर ऐसा होता है तो एकनाथ शिंदे के लिए और मुश्किल खड़ी हो जाएगी.

4-बीएमसी चुनाव हर हाल में जीतना होगा
एकनाथ शिंदे के लिए बीएमसी चुनाव हर हाल में जीतना होगा.हालांकि बीएमसी के चुनाव महायुति की छत्र छाया होने के चलते बीजेपी और एनसीपी का भी सपोर्ट मिलेगा. पर शिवसेना यूबीटी यहां अपने पूरे फॉर्म में रहने वाली है. यूबीटी के साथ जनता की सहानुभूति भी अबकी बार मिलने वाली है. एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री न बनने के चलते मराठों की नाराजगी को भी उन्हें झेलना पड़ सकता है.

5-हिंदुत्व के तीन दावेदारों में नंबर एक बनने की मचेगी होड़
राजनीति में हर कदम भविष्य के लिए होता है. महाराष्ट्र में हिंदुत्व की राजनीति करने वाली अब 3 पार्टियां हो जाएंगी. भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना और शिवसेना यूबीटी. शिवसेना यूबीटी ने भले ही कांग्रेस और एनसीपी शरद पवार के साथ विधानसभा चुनाव लड़ा पर सावरकर और मुस्लिम शासकों के नाम शहरों नाम पर कभी एमवीए वाले रुख का समर्थन नहीं किया. शिवसेना यूबीटी ने हिंदुत्व की राजनीति के चलते ही केवल एक मुस्लिम को टिकट दिया. और जैसा सुनने में आ रहा है कि उद्धव ठाकरे इंडिया गठबंधन को छोड़ने का मन बना लिया है. जाहिर है कि महाराष्ट्र में अब शुरू होगी कट्टर हिंदुत्व की जंग. तीनों पार्टियां खुद को हिंदुओं का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार होंगी. अब देखना होगा कि एकनाथ शिंदे खुद को कैसे साबित करते हैं.

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