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गम, गुस्सा और बगावत, महायुति में महासंकट की आहट, एकनाथ शिंदे और अजित पवार की टेंशन बढ़ी

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मुंबई

चुनाव परिणाम के बाद लंबे इंतजार के बाद महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की सरकार बनी। 10 दिन के अंतराल के बाद मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ। एक ओर दो दिनों से मंत्री अपने महकमे का इंतजार कर रहे हैं, दूसरी ओर महायुति के तीनों दलों बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी में गम, गुस्सा और बगावत से जूझ रहे हैं। फडणवीस मंत्रिमंडल में शिंदे सरकार के 11 सीनियर मंत्री ड्रॉप कर दिए गए। मंत्री पद के कई बड़े दावेदारों को भी ढाई साल की वेटिंग लिस्ट में भेज दिया गया। इसके अलावा तीनों दलों में कई विधायक ऐसे हैं, जिन्हें भी मायूसी मिली। अब वे बयानबाजी और बगावत के संकेत दे रहे हैं यानी महायुति सरकार में शामिल दलों के मुखिया के सामने महासंकट आने वाला है।

छगन भुजबल गए नासिक, शरद पवार के पास लौटेंगे?
नागपुर में देवेंद्र फडणवीस मंत्रिमंडल विस्तार में शिंदे सरकार के 11 मंत्रियों की छुट्टी हो गई और 25 नए चेहरे शामिल किए गए। अजित पवार की एनसीपी ने सर्वाधिक पांच पूर्व मंत्रियों को ड्रॉप किया। छगन भुजबल, संजय बनसोडे, अनिल पाटिल, धर्मराव बाबा आत्राम और दिलीप वाल्से पाटिल को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। बीजेपी और शिवसेना ने तीन-तीन मंत्रियों को एक्स-मिनिस्टर बना दिया। बीजेपी के रवींद्र चव्हाण, सुधीर मुनगंटीवार और विजय कुमार गावित की छुट्टी हो गई। शिवसेना ने अब्दुल सत्तार, दीपक केसरकर और तानाजी सावंत को वेटिंग लिस्ट में डाल दिया। इस फैसले पर शिवसेना और एनसीपी में उम्मीद के मुताबिक प्रतिक्रिया भी आने लगी है। छगन भुजबल समर्थकों के साथ नासिक लौट गए। चर्चा है कि वह फिर शरद पवार के खेमे में जा सकते हैं। उन्होंने राज्यसभा के ऑफर को भी ठुकरा दिया है।

शिवसेना विधायकों ने शिंदे के नेतृत्व पर उठाए सवाल
शिवसेना में खाली हाथ रहने वाले नेताओं ने भी बयानबाजी शुरू कर दी है। उन्होंने अनदेखी के बाद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व पर भी सवाल उठाए हैं। विधायक नरेंद्र भोंडेकर ने नागपुर में शपथ ग्रहण से पहले पार्टी के पदों से इस्तीफा देकर नाराजगी जाहिर दी थी। अब पुरंदर के विधायक विजय शिवतारे ने ऐलान किया है कि वह ढाई साल बाद भी मंत्री पद स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि मंत्री पद मिलने का मलाल नहीं है मगर वह अपने साथ हुए व्यवहार से दुखी हैं। शिवतारे ने एक और सख्त बयान दिया कि कार्यकर्ता किसी का गुलाम नहीं है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र को बिहार की राह पर धकेला जा रहा है, जहां क्षेत्रीय संतुलन के बजाय नेताओं की जाति देखी जा रही है। उद्धव के खिलाफ एकनाथ शिंदे की बगावत के साथी रहे विधायक प्रकाश सुर्वे भी आलोचकों में शुमार हो गए हैं। सुर्वे ने कहा कि उन्होंने संघर्ष के बाद ही कुछ हासिल किया है और आगे भी संघर्ष करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल में शामिल कई लोग बड़े नेताओं के बच्चे हैं, मैं नहीं हूं।

बीजेपी के नेताओं ने भी इशारे में जता दिया विरोध
बीजेपी में ड्रॉप किए गए मंत्री खामोश हैं, मगर सुधीर मुनगंटीवार ने इशारों में सीएम देवेंद्र फडणवीस के फैसले पर नाराजगी जाहिर की है। फडणवीस ने दावा किया था कि मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए गए नेताओं से लंबी बातचीत की गई और उन्हें भरोसे में लिया गया। सुधीर मुनगंटीवार ने उनके इस दावे का खंडन कर दिया। रवींद्र चाह्वान बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं। महायुति के कई नेताओं को सीएम फडणवीस का एक बयान नागवार गुजरा है। सीएम ने कहा था कि एकनाथ शिंदे मंत्रिमंडल में इस बार जिन लोगों को शामिल नहीं किया गया, उन्हें उनके प्रदर्शन के कारण हटा दिया गया है। शिवसेना के एक नेता ने बताया कि मंत्री पद सभी को नहीं मिल सकता है, कुछ सीनियर नेता समितियों में एडजस्ट किए जाएंगे।

एनसीपी-शिवसेना के नेताओं के पास मौजूद है विकल्प
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मंत्री नहीं बनने की कसक महायुति के सभी दलों के नेताओं में है, मगर इसका असर शिवसेना और एनसीपी में ज्यादा नजर आएगा। दोनों पार्टियां सरकार के दम पर आगे बढ़ सकती है। अजित पवार और एकनाथ शिंदे ने जब पार्टी तोड़ी थी, तब उनका लक्ष्य सरकार बनाना था। अपनी मूल पार्टी से बगावत करने वाले नेता भी मंत्री और सत्ता में हिस्सेदारी के लालच से ही शिंदे और पवार के साथ आए थे। महायुति की ताजा प्रॉब्लम यह है कि बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी ने अच्छे स्ट्राइक रेट से चुनाव में बड़ी जीत हासिल की है। बीजेपी राष्ट्रीय पार्टी है और देवेंद्र फडणवीस को नरेंद्र मोदी-अमित शाह का आशीर्वाद प्राप्त है। ऐसे में बीजेपी के मायूस नेताओं के सामने सब्र करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एनसीपी-शिवसेना के नेताओं के पास अपनी मूल पार्टी में लौटने का विकल्प खुला है। निकाय चुनाव के दौरान दलबदल संभव है।

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