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महाराष्ट्र में बड़ी जीत भी मुसीबत, ढाई साल मंत्री का फॉर्मूला, बीजेपी की रणनीति पर क्यों चले एकनाथ शिंदे और अजित पवार?

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मुंबई

महाराष्ट्र के नए मंत्रियों के शपथ लेने से एक दिन पहले 14 दिसंबर को विधायक अपने पीए के बजाय खुद मोबाइल फोन लेकर बैठे थे। चुनाव परिणाम घोषित होने के 22 दिन बाद मंत्रिमंडल का विस्तार होना था। सभी शपथ ग्रहण के लिए कॉल का इंतजार कर रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कॉल किसी समय आ सकता है। 15 दिसंबर को आखिरकार 39 मंत्रियों ने शपथ ली और मंत्रिमंडल में 42 सदस्य हो गए। इससे पहले सीएम देवेंद्र फडणवीस और उनके दो डिप्टी एकनाथ शिंदे और अजीत पवार ने बताया कि मंत्रियों के कामकाज का ढाई साल बाद मध्यावधि समीक्षा करेंगे। उनका यह सार्वजनिक बयान जवाबदेही से ज्यादा राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश थी। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रतीक महाजन लिखते हैं कि यह उन दावेदारों के लिए आश्वासन था, जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली।

यूपी में विधायकों की नाराजगी बीजेपी को महंगी पड़ी थी
लोकसभा चुनावों में एक बड़े झटके के बाद महायुति (एनडीए) ने 288 विधानसभा सीटों में से 237 पर कब्जा करके बड़ी वापसी की। इस जीत के बाद भी महायुति के सामने चुनौतियां बढ़ गई। यूपी का अनुभव है कि जब ज्यादा विधायक जीत जाते हैं तो पार्टी के अंदर असंतोष का खतरा भी बढ़ जाता है। जो विधायक खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं, वह पार्टी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। यूपी में लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को इसका खमियाजा भुगतना पड़ा था। यूपी से सबक लेते हुए महायुति की पार्टियों ने समीक्षा के बहाने ढाई साल का फॉर्मूला निकाला, ताकि गठबंधन के गठबंधन के भीतर सत्ता संघर्ष को रोका जा सके। यह स्ट्रैटजी प्रभुत्व स्थापित करने, दरकिनार किए गए विधायकों को खुश करने और गठबंधन की राजनीति की बदलती परिस्थितियों से निपटने में सही साबित हो सकती है।

महायुति में सत्ता पर नियंत्रण और प्रभुत्व की लड़ाई
प्रतीक महाजन के अनुसार, महायुति के तीनों नेता अजित पवार, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस अब एक ऐसी पार्टियों का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसने पिछले पांच वर्षों में नाटकीय परिवर्तन किए हैं। पांच साल तक सीएम रहे देवेंद्र फडणवीस को 2022 में शिंदे की शिवसेना के पीछे जाना पड़ा। अब जब सरकार पर बीजेपी का नियंत्रण हो चुका है, फडणवीस एक बार फिर अपने सीएम वाले अधिकार को स्थापित करने को तैयार हैं। 2022 में शिवसेना में बगावत करने के एकनाथ शिंदे के साहसिक निर्णय ने उन्हें 2.5 वर्षों के लिए सीएम का पद दिलाया। अब वे डिप्टी सीएम पद बने हैं, यह शिंदे सेना को अस्थिर करने वाला बदलाव है।

बड़ी चुनाव जीत ने ही बोए पार्टियों में असंतोष के बीज
लोकसभा चुनाव में शरद गुट के मुकाबले बुरी तरह हारने के बाद लगा कि अजित पवार की राजनीति खत्म होने वाली है, मगर विधानसभा चुनाव में जीत ने उन्हें फिर से प्रासंगिक बना दिया। इस बदलाव ने प्रत्येक पार्टी के भीतर महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए सत्ता को चुनौती देने के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की है। ऐसी स्थिति में ढाई साल बाद मंत्रियों की कामकाज की समीक्षा से पार्टी को कंट्रोल और अनुशासित बनाने का सिस्टम मिल गया है। अब सभी महायुति के नेता भविष्य में मौका देने का वादा कर असंतोष से निपट सकते हैं। महायुति के पास 237 विधायक हैं, लेकिन केवल 42 कैबिनेट पद हैं। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सुधीर मुनगंटीवार, विजय कुमार गावित और छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेता खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं।

केंद्र से भी कठिन है महाराष्ट्र में मंत्री का फॉर्मूला
नॉर्थ महाराष्ट्र में रिसर्च कर रहे प्रतीक बताते हैं कि महाराष्ट्र में मंत्रिमंडल का फॉर्मूला केंद्र से भी कठिन है। केंद्र में एनडीए ने हर चार लोकसभा सांसदों पर एक मंत्री बनाया, महाराष्ट्र में 6 विधायकों पर एक मंत्री बनाया गया। मंत्रिमंडल में वेकेंसी इतनी कम है कि बीजेपी ने 6.5 विधायकों पर एक मंत्री बनाया है। अजित पवार की एनसीपी के पास हर चार विधायकों पर एक मंत्री पद मिला जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना के पास हर पांच विधायकों पर एक मंत्री है। बीजेपी ने कम मंत्रियों के साथ रणनीतिक संतोष किया है, ताकि गठबंधन की एकता बनी रहे। इसके एवज में बीजेपी गृह समेत प्रमुख मंत्रालय अपने पास रख सकती है, जिस पर एकनाथ शिंदे की नजर भी टिकी है। बीजेपी यह भूली नहीं है कि 2019 में सीएम पद को लेकर उद्धव ठाकरे की शिवसेना गठबंधन छोड़ गई थी।

बीजेपी के फ्यूचर प्लान से शिंदे और पवार चिंतित
प्रतीक महाजन के अनुसार, बीजेपी सरकार में शामिल होने के बाद भी अजित पवार और शिंदे दोनों ही चिंतित हैं। अमित शाह ने एक बयान दिया था कि बीजेपी 2029 तक अपने दम पर राज्य सरकार बनाएगी। बीजेपी के कई नेताओं ने भविष्य के चुनावों में अपने दम पर 200 सीटें जीतने की महत्वाकांक्षा जाहिर की है। ऐसे बयानों से बीजेपी अपने सहयोगियों पर प्रेशर बनाए रखना चाहती है। साथ ही यदि हालात बदलते हैं तो वह फिर से समझौते के लिए रास्ते खोलकर रखना चाहती है। कुल मिलाकर मंत्रियों के काम की मध्यावधि समीक्षा महाराष्ट्र के लोगों की आकांक्षाओं से ज्यादा गठबंधन की राजनीति में मैनेजमेंट का तरीका ही लगती है। अब आने वाले वक्त में पता चलेगा कि क्या यह रणनीति वास्तविक शासन सुधारों को बढ़ावा देती है या केवल उस संतुलन साधने का तरीका है।

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