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खनौरी बॉर्डर तक क्यों सिमटा किसान आंदोलन, सैनी के एक फैसले से हरियाणा के किसानों ने बनाई दूरी

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चंडीगढ़:

खनौरी बॉर्डर पर किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल आमरण अनशन कर रहे हैं। उनकी हालत गंभीर है। धरना स्थल पर पंजाब के किसान संगठन के नेताओं का जमावड़ा लगा है। आंदोलन को समर्थन देने छोटे-छोटे समूहों में किसान खनौरी बॉर्डर पर आते हैं, फिर लौट जाते हैं। इस धरने में हरियाणा के कई किसान नेता भी पहुंचे, मगर वहां के आम लोग इससे दूर ही रहे। माना जा रहा है कि हरियाणा के किसानों की गैरमौजूदगी के कारण आंदोलन के तेवर फीके पड़ गए हैं। 2020 के किसान आंदोलन में हरियाणा और पंजाब के किसान शामिल थे, तब केंद्र सरकार को कृषि कानून वापस लेना पड़ा था।

खनौरी बॉर्डर पर पंजाब के नेता
संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) और किसान मजदूर मोर्चा (केएमएम) के नेतृत्व में हो रहे इस आंदोलन को पलीता हरियाणा की नायब सिंह सैनी सरकार की योजनाओं ने लगाया। आंदोलनकारी किसानों की प्रमुख मांग एमएसपी कानून को लागू करना है। हरियाणा सरकार पहले ही 24 फसलों पर एमएसपी दे रही है। इसके अलावा अक्तूबर में सत्ता वापसी के बाद हरियाणा सरकार कीमत में अंतर होने पर भरपाई की स्कीम भी चला रही है। हरियाणा के किसानों को इससे फायदा मिल रहा है और वह खनौरी बॉर्डर पर हो रही गतिविधियों से दूर हैं। हालांकि शनिवार को हुई महापंचायत में हरियाणा के कुछ किसान नेता शामिल हुए, मगर वहां टिके नहीं। खनौरी बॉर्डर पर धरने पर बैठने वालों अधिकतर पंजाब के किसान हैं।

किसान संगठनों की आपसी फूट
खनौरी बॉर्डर के आंदोलन में कई किसान संगठन शामिल नहीं है। संयुक्त किसान मोर्चा ने खुद गैर राजनीतिक घोषित करते हुए उन नेताओं से दूरी बना ली, जो 2020 के आंदोलन के बाद चुनावी राजनीति में कूद पड़े। इसके अलावा किसान नेताओं ने खुद को अलग-अलग पावर सेंटर के तौर पर स्थापित कर लिया। गुरनाम सिंह चढूनी के नेतृत्व वाला भारतीय किसान यूनियन भी आंदोलन में शामिल नहीं है। बीकेयू के राकेश टिकैत का संगठन भी पूरे धार के साथ दल्लेवाल के समर्थन में आगे नहीं आया। हरियाणा के कई किसान संगठन भी संयुक्त किसान मोर्चे को सम्मानपूर्वक आमंत्रित नहीं करने से नाराज हैं। अब आलम यह है कि हरियाणा सरकार ने आंदोलन को शंभू और खनौरी बॉर्डर तक सीमित कर दिया है।

क्या है बीकेयू का दावा?
बीकेयू (शहीद भगत सिंह) के अध्यक्ष अमरजीत सिंह मोहरी ने दावा किया है कि भले ही वैचारिक मतभेद के कारण हरियाणा के किसान अभी के आंदोलन से दूर हैं, मगर अब उनका समर्थन मिलने लगा है। टोहाना और खनौरी सीमा पर हुई किसान महापंचायतों में हरियाणा के किसान भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि अगली 10 जनवरी को हरियाणा के किसान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले जलाकर अपना गुस्सा जाहिर करेंगे।

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