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बच्चे दो से ज्यादा ही अच्छे… आबादी क्यों बढ़ाना चाहते हैं दक्षिण भारत के नेता? यह जानना जरूरी है

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तिरुपति

आंध्र प्रदेश के सीएम एन चंद्रबाबू नायडू ने एक बार फिर लोगों से दो से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील की है। कुछ दिन पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने भी दो से अधिक बच्चे पैदा करने की वकालत की थी। दोनों नेताओं के अधिक बच्चे पैदा करने वाले अपील के बाद इस पर देश भर में बहस शुरू हो गई है। दक्षिण के राज्यों के नेताओं का मानना है कि अगर उत्तर भारत के मुकाबले 2031 तक आबादी का संतुलन नहीं बनाया गया तो संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा और राष्ट्रीय निर्णय में उनका प्रभाव भी खत्म हो जाएगा। हालांकि सीएम चंद्राबाबू नायडू इसे देश की समस्या मानते हैं, जिससे अभी यूरोप के कई देश झेल रहे हैं। उनका कहना है कि आंध्र के कई गांवों में सिर्फ बूढ़े ही बचे हैं, जबकि हमें काम के लिए यंग फोर्स की जरूरत है।

चंद्राबाबू की चेतावनी, सिर्फ बुजुर्ग ही नजर आएंगे
मकर संक्रांति पर अपने पैतृक गांव नरवरिपल्ली पहुंचे चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि लगातार कम हो रहा फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर कई देशों के लिए चिंता का विषय बन गया है। जापान, कोरिया समेत कई यूरोप देश प्रजनन दर कम होने और बढ़ती उम्र की आबादी की समस्या से जूझ रहे हैं। यह भारत के लिए चेतावनी है क्योंकि हम दो बच्चों पैदा करने के लिए लोगों को मजबूर कर रहे हैं। अगर परिवार नियोजन की पॉलिसी नहीं बदली तो कुछ वर्षों में भारत को बढ़ती उम्र की समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। चंद्राबाबू नायडू ने कहा कि पहले दो से अधिक बच्चों को पंचायत चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता था। अब कम बच्चों वालों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए नियम बनाने होंगे। बता दें कि 2024 में सत्ता में आने के बाद टीडीपी सरकार आंध्र प्रदेश में दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने वाले नियम को रद्द कर चुकी है।

जनसंख्या में बड़ी गिरावट के संकेत
70 के दशक में देश के सभी सरकारों ने पॉपुलेशन कंट्रोल के लिए परिवार नियोजन अभियान चलाया। ‘हम दो हमारे दो’ और ‘बच्चे दो ही अच्छे’ के नारों से शहर से लेकर गांव कस्बे की दीवारें रंग दी गई। परिवार नियोजन के अन्य तौर-तरीकों का जमकर प्रचार हुआ। इसका असर पूरे देश में हुआ, मगर दक्षिण भारत के राज्यों ने इस पॉलिसी को दशकों पहले हासिल कर लिया। 1988 में केरल में फर्टिलिटी रेट दो के करीब पहुंच गया। 1993 में तमिलनाडु, 2001 में आंध्रप्रदेश और 2005 में कर्नाटक भी इस लिस्ट में शामिल हो गया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों के अनुसार, अभी पूरे देश में टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) 2.1 है, मगर दक्षिण भारत के राज्यों में यह राष्ट्रीय औसत से भी नीचे 1.75 पर पहुंच गया है। एक्सपर्ट भी मानते हैं कि अगर ऐसा ट्रेंड बना रहा तो जनसंख्या में तेजी से गिरावट आ सकती है।

गरीब बुजुर्गों को कैसे संभालेगा भारत
यूनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड ने एक रिपोर्ट में बताया कि उम्र के लिहाज से जनसंख्या का असंतुलन भारत के लिए मुसीबत बन सकता है। सबसे बड़ी दिक्कत इन बुजुर्गों के स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर होगी। भारत के 40 प्रतिशत बुजुर्ग गरीब हैं और 20 प्रतिशत गरीबी रेखा के सबसे आखिरी छोर हैं। बुजुर्ग बढ़ेंगे तो ओल्ड ऐज होम की डिमांड भी बढ़ेगी। कई अन्य रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत को 2047 तक वैश्विक ताकत बनने के लिए जितने युवाओं की जरूरत होगी, उसे आज से प्रजनन के दर से पाना मुश्किल है। ऐसा भी हो सकता है कि जब भारत विकासशील देश से विकसित बनने की ओर अग्रसर हो, तब उसके पास पर्याप्त यंग फोर्स नहीं हो।

2031 में सीटें बंटी तो होगा नुकसान
अगर दक्षिण भारत और उत्तर भारत में जनसंख्या का गैप बढ़ेगा तो इसका असर देश की राजनीतिक स्थिति पर भी पड़ेगा। संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का फिर से बंटवारा करना अनिवार्य है। हालांकि 1976 के बाद से लोकसभा में सदस्यों की संख्या में कोई फेरबदल नहीं किया गया। साथ ही राज्यों में भी सीटें बरकरार रहीं। 1981 और 1991 की जनगणना के बाद परिसीमन नहीं हुआ। 2001 में भी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान परिसीमन हुआ मगर सीटों की संख्या में बदलाव नहीं किया। 2026 के बाद लोकसभा क्षेत्रों को फिर से बांटा जा सकता है। 2031 के जनगणना के बाद आबादी के हिसाब से लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण किया जाएगा।

क्यों टेंशन में हैं दक्षिण भारत के राजनेता
लोकसभा में 543 सीटें हैं। अगर सीटों का परिसीमन हुआ तो यूपी, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और राजस्थान में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ जाएगी। जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक को कुछ सीटें गंवानी पड़ेगी। जनसंख्या के अनुपात में सीटें बंटी तो केरल में लोकसभा सीटें 20 से घटकर 19 हो जाएगी। यूपी में 14 सीटों का इजाफा हो जाएगा। बिहार में भी सीटें बढ़ेंगी। आंध्र और तमिलनाडु में भी सीटें कम हो जाएंगी। अगर लोकसभा की कुल सीटों को बढ़ाकर 753 भी किया गया तब भी दक्षिण भारत के राज्यों के हिस्से में कम सांसद ही आएंगे। अभी दक्षिण भारत में कुल 130 लोकसभा सीटें हैं। अगर संसद में सीटें कम हुईं तो राष्ट्रीय फैसलों में दक्षिण भारत का दखल भी कम हो जाएगा। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्हें नियंत्रित जनसंख्या वृद्धि के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए। इससे उत्तर और दक्षिण भारत में राजनीतिक विभाजन होने का भी खतरा है।

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