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Thursday, March 26, 2026
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सिर्फ ‘गंदी भाषा’ का इस्तेमाल महिला के ‘शील भंग’ का केस दर्ज करने के लिए पर्याप्त नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला

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नई दिल्ली

एक महिला कर्मचारी को उसके संस्थान ने नौकरी से निकाल दिया जाता है। उसका लैपटॉप ले लिया जाता है। महिला आरोप लगाती है कि उसे जबरन टर्मिनेट कर दिया गया। उसका लैपटॉप जब्त कर लिया गया जिसमें उसकी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी थी। कंपनी के सिक्योरिटी गार्ड्स के जरिए उसे दफ्तर के परिसर से बाहर करवा दिया गया। इतना ही नहीं, महिला के मुताबिक, जब उसे टर्मिनेट किया जा रहा था तब उसके दो सीनियरों ने उसके खिलाफ गंदी भाषा का इस्तेमाल किया। उसकी शिकायत पर दोनों सीनियरों के खिलाफ महिला के ‘शील भंग’ के आरोप में केस दर्ज हुआ। आरोपी हाई कोर्ट गए लेकिन राहत नहीं मिली। फिर वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और आखिरकार उन्हें बड़ी राहत मिली जब शीर्ष अदालत ने कहा कि सिर्फ गंदी भाषा का इस्तेमाल महिला की लज्जा भंग का केस दर्ज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। नीयत स्पष्ट होना जरूरी है। आइए जानते हैं पूरा मामला।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस मामले में अहम आदेश दिया। उसने अपने फैसले में साफ किया कि सिर्फ ‘गंदी भाषा’ का इस्तेमाल करने से इंडियन पेनल कोड यानी IPC की धारा 509 के तहत मामला दर्ज नहीं हो सकता। यह धारा महिलाओं के ‘शील भंग’ यानी ‘लज्जा भंग’ करने से संबंधित है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर गंदी भाषा के साथ कोई ऐसा संदर्भ या भाव-भंगिमा न हो जिससे महिला की लज्जा भंग करने का इरादा जाहिर हो, तो यह धारा लागू नहीं होगी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस पंकज कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा कि ‘गंदी भाषा’ शब्द का इस्तेमाल अपने आप में धारा 509 के तहत अपराध नहीं है। इसके साथ संदर्भ, भाव-भंगिमा या शब्दों का ऐसा इस्तेमाल होना जरूरी है जिससे महिला की लज्जा भंग करने का इरादा साबित हो।

इस मामले में आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 509 के अलावा धारा 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 504 (जानबूझकर अपमान करना जिससे शांति भंग हो) और 506 (धमकी देना) के तहत FIR दर्ज की गई थी। आरोपी एफआईआर और चार्जशीट को रद्द कराने की मांग को लेकर पहले कर्नाटक हाई कोर्ट पहुंचे थे। HC ने जब एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने से इनकार कर दिया तो आरोपियों ने शीर्ष अदालत का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए न सिर्फ उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 509 के तहत अपराध को रद्द कर दिया बल्कि धारा 323, 504 और 506 के तहत दर्ज केस को भी रद्द कर दिया। यानी आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को ही रद्द करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं की कार्रवाई से यह साबित नहीं होता कि उनका इरादा महिला की लज्जा भंग करना था। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह लगे कि आरोपियों ने ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिससे धारा 509 के तहत अपराध बनता हो। कोर्ट ने कहा कि हालांकि चार्जशीट में आरोप है कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता को ‘गंदी भाषा’ का इस्तेमाल करके डांटा, लेकिन FIR में इस बात का जिक्र नहीं हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया, उनका कोई संदर्भ, भाव-भंगिमा या शिकायत में “गंदी भाषा” के इस्तेमाल का कोई जिक्र नहीं है; और यह आरोप सिर्फ चार्जशीट में है: शिकायतकर्ता की लज्जा भंग करने के दावे को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री को देखते हुए, हमारा मानना है कि IPC की धारा 509 के तहत अपराध के प्रथम दृष्टया तत्व सामने नहीं आए हैं।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 323 के तहत सजा के लिए जानबूझकर चोट पहुंचाने का कार्य होना चाहिए लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं है। इसी तरह आपराधिक धमकी के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह साबित होना चाहिए कि आरोपी का इरादा शिकायतकर्ता को डराना था लेकिन ये बात भी मौजूद नहीं है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में IPC की धारा 323, 504, 506 और 509 में से किसी भी धारा के तत्व मौजूद नहीं हैं।

पहले भी अदालतों ने ऐसे मामलों में सुनाए हैं अहम फैसले
इससे पहले भी अलग-अलग समय पर अदालतों ने ऐसे मामलों में अहम फैसले सुनाए हैं। अक्टूबर 2022 में दिल्ली की एक अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि किसी महिला का अपमान करने और उसकी लज्जाभंग करने में अंतर होता है। किसी ने किसी महिला का अपमान कर दिया तो इसका मतलब ये नहीं कि उसने महिला का शीलभंग कर दिया। कोर्ट ने आईपीसी की धारा 509 के तहत आरोपी बनाए गए शख्स को बरी कर दिया था।

इसी तरह अगस्त 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी अपने आदेश में कहा था कि महिला का अपमान करना, शील भंग करना नहीं होता है। उस मामले में महिला ने खुद को ‘गंदी औरत’ कहे जाने को लेकर एक पुरुष के खिलाफ आईपीसी की धारा 509 के तहत केस दर्ज कराया था। हाई कोर्ट ने शख्स को बरी करते हुए कहा कि किसी महिला का अपमान करना या उसके साथ असभ्य या अमर्यादित व्यवहार करना उस महिला का शील भंग करना नहीं कहा जाएगा।

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