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महाकुंभ में क्यों मची भगदड़, 1954 में मौनी अमावस्या पर ऐसी एक अफवाह से अफरा-तफरी में हुई थी 800 की मौत

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नई दिल्ली:

3 फरवरी, 1954 सुबह करीब 8 बजे के आसपास का वक्त रहा होगा। जब प्रयागराज में लगे कुंभ मेले में मौनी अमावस्या के लिए लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। अचानक कुछ अफवाहें पैदा हुईं, जिससे स्नान पर्व पर भगदड़ मच गई। 45 मिनट तक चले मौत के तांडव में करीब 800 श्रद्धालुओं की मौत हो गई। ऐसा माना जाता है कि उस कुंभ में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी आए थे।

इस बार भी प्रयागराज में महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन ही भगदड़ मची, जिसमें कुछ लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबरें हैं। खैर महाकुंभ में हालात नियंत्रण में हैं। जानते हैं देश की आजादी के बाद लगे पहले कुंभ के दौरान सबसे भीषण भगदड़ की, जिसमें 800 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। यह जानेंगे कि इन हादसों की क्या वजहें होती हैं।

इस बार के महाकुंभ में क्यों मची भगदड़, जानिए वजह
इस बार के महाकुंभ में भगदड़ का यह हादसा रात करीब 1 बजे उस वक्त हुआ, जब संगम पर मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर एकाएक भीड़ बढ़ने लगी। लोग मुख्य संगम पर ही स्नान करने की जिद करने लगे। तभी बढ़ते भीड़ के दबाव के कारण संगम के रास्ते में लगी बैरिकेडिंग टूट गई। इससे अचानक मेले में भगदड़ मच गई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जब लोग स्नान के लिए जा रहे थे, तभी बैरिकेडिंग के पास लोग सोए हुए थे। इसके चलते लेटे हुए लोगों के पैरों में फंसकर कुछ लोग गिर गए। उनके गिरते ही पीछे से आ रही लोगों की भीड़ एक के ऊपर एक गिरती चली गई।

जब गंगा में अचानक पानी बढ़ने की मची थी अफवाह
बताया जाता है कि इसी तरह 1954 में कुभ के दौरान भी ऐसा ही हादसा हुआ था। 2 और 3 फरवरी की दरमियानी रात को गंगा में अचानक बहुत पानी बढ़ गया। संगम किनारे साधु-संतों के आश्रम में पानी पहुंचने लगा। इस घटना से लोग घबरा गए। इससे अफरा-तफरी में भगदड़ मच गई। कुंभ का अंतरराष्ट्रीयकरण भी नेहरू ने ही किया था। इस मौके को लेकर देश-विदेश में नेहरू के कई लेख भी छपे। उस साल मेले में करीब 50 लाख श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। यह भारत की स्वतंत्रता के बाद पहला कुंभ मेला भी था। इस वजह से भी बड़ी संख्या में लोग उस वक्त के इलाहाबाद में पहुंचे थे।

जवाहरलाल नेहरू भी कुंभ में हुए थे शामिल, पर कब?
1954 के कुंभ में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हुए थे। अमावस्या के एक दिन पहले नेहरू जी आए भी थे और उन्होंने संगम में स्नान भी किया था, लेकिन उसी दिन वो तैयारियों से संतुष्ट होकर वापस लौट गए थे। हादसे के बाद नेहरू ने न्यायमूर्ति कमलाकांत वर्मा की अध्यक्षता में जांच कमेटी बनाई गई। हादसे के बाद नेहरू ने नेताओं और अतिविशिष्ट लोगों से स्नान पर्वों पर कुंभ न जाने की अपील की थी। उस घटना के बाद से अरसे तक कुंभ में भगदड़ नहीं मची थी।

शाही स्नान के दौरान पीएम के हेलीकॉप्टर के आने की अफवाह
प्रयागराज में गंगा के किनारे बसे दारागंज निवासी 83 वर्षीय पंडित रामनरेश उपाध्याय बताते हैं कि 1954 में मौनी आमावस्या के उस स्नान पर्व पर हुए हादसे को मैंने अपनी आंखों से देखा था। दरअसल, हुआ यह था कि उस दिन अखाड़ों के शाही स्नान के दौरान ही ये अफवाह फैल गई कि प्रधानमंत्री नेहरू का हेलीकॉप्टर मेला क्षेत्र में आ रहा है। इस अफवाह पर यकीन करके कुछ लोग उन्हें देखने के चक्कर में भागने लगे। इस अफरा-तफरी से कुछ नागा साधु गुस्से में आकर चिमटों से हमला बोल दिया। ऐसे में और अफरा-तफरी मच गई।

45 मिनट तक चलता रहा था यह मौत का तांडव
भगदड़ यानी मौत का यह तांडव करीब 45 मिनट तक चलता रहा। इसके कुछ ही समय बाद भीड़ खुद ही नियंत्रित हो गई। विभिन्न स्रोतों के अनुसार त्रासदी के आंकड़े अलग-अलग थे। द गार्जियन ने बताया कि 800 से अधिक लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। वहीं, द टाइम ने बताया कि कम से कम 350 लोग कुचले गए और डूब गए, 200 लापता बताए गए और 2,000 से अधिक घायल हुए। किताब ‘लॉ एंड ऑर्डर इन इंडिया’ के अनुसार, 500 से अधिक लोग मारे गए।

ये थी अहम वजह, जान लीजिए एक-एक बात
1954 के कुंभ मेले के अवसर का उपयोग राजनेताओं की ओर से भारत की स्वतंत्रता के बाद जनता से जुड़ने के लिए किया गया था। यह स्वतंत्रता के बाद पहला कुंभ मेला था। इस आयोजन के दौरान कई प्रमुख राजनेताओं ने शहर का दौरा किया। भीड़ नियंत्रण उपायों की विफलताओं और बड़ी संख्या में राजनेताओं की उपस्थिति ने इस भगदड़ को अंजाम देने का प्रमुख कारण रहा था।

क्या गंगा ने बदल दिया था रास्ता या कुछ और भी वजह
इसके अलावा, भगदड़ की उस घटना में योगदान देने वाला एक प्रमुख कारक यह था कि गंगा नदी ने अपना मार्ग बदल दिया था। वह तटबंध और शहर के करीब आ गई थी, जिससे अस्थायी कुंभ टाउनशिप के लिए उपलब्ध स्थान कम हो गया और लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित हो गई। इसके अलावा, जिस चीज ने त्रासदी को जन्म दिया, वह थी भीड़ का बढ़ना। यह भीड़ हर बाधाओं को तोड़ते हुए कई अखाड़ों के साधुओं और नागाओं से जा टकराई। इसके बाद तो भगदड़ मच गई। जिसे जिस ओर मौका लगा, भागने लगा। लोग कुचलने लगे और हर ओर लाशें बिछ गईं।

इन उपन्यासों में 1954 के कुंभ की भगदड़ का जिक्र
चर्चित लेखक विक्रम सेठ के 1993 के उपन्यास ‘ए सूटेबल बॉय’ में 1954 के कुंभ मेले में हुई भगदड़ का जिक्र है। उपन्यास में इस आयोजन को कुंभ मेला की जगह ‘पुल मेला’ कहा गया है। इसे 2020 के टेलीविजन सीरियल में भी पुल मेला के रूप में दर्शाया गया है। कलकुट (समरेश बसु) और अमृता कुंभेर संधाने द्वारा लिखे गए उपन्यास में तीर्थयात्रियों की प्रतिक्रिया के साथ भगदड़ की त्रासदी को उजागर किया गया है। बाद में इस पर एक फिल्म भी बनाई गई।

जांच आयोग से मेला प्रबंधन के लिए खुली राह
भारत के इतिहास में सबसे खराब भगदड़ हादसे के बाद गठित न्यायिक जांच आयोग का नेतृत्व न्यायमूर्ति कमला कांत वर्मा ने किया था और इसकी सिफारिशें आने वाले दशकों में भविष्य के आयोजनों के बेहतर प्रबंधन का आधार बनीं। यह त्रासदी मेला योजनाकारों और जिला प्रशासकों के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में मानी जाती हैं। इससे पहले 1840 और 1906 के कुभों के दौरान भी भगदड़ मची, जिसमें जान-माल का काफी नुकसान हुआ था।

इन कुंभों में भी भगदड़ मची थी, जानिए कहानी
कुंभ में सबसे पहली भगदड़ 1954 में मची थी। प्रयागराज के कुंभ मेले में 3 फरवरी 1954 को मौनी अमावस्या के दिन भगदड़ मची थी। इस हादसे में 800 लोगों की मौत हुई थी। वही, 1992 में उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ मेले के दौरान मची भगदड़ के दौरान 50 से अधिक श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। महाराष्ट्र के नासिक में 2003 के कुंभ मेले के दौरान 27 अगस्त को भगदड़ मच गई थी। इस भगदड़ में 39 लोगों की मौत हो गई थी। उत्तराखंड के हरिद्वार में 2010 में कुंभ मेले के दौरान 14 अप्रैल को भगदड़ मच गई थी। इसमें 7 लोगों की मौत हो गई थी। इसी तरह प्रयागराज में 2013 में भी कुंभ मेले का आयोजन हुआ था। यह घटना मौनी अमावस्या पर 10 फरवरी को अमृत स्नान के दौरान घटी थी। प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में 36 लोगों की मौत हो गई थी।

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