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महाकुंभ भगदड़: बहुत देर से जागी योगी सरकार.. क्या 30 मौतों का कर रहे थे इंतजार?

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प्रयागराज

प्रयागराज महाकुंभ। आस्था का महाकुंभ। 144 वर्ष बाद आने वाले बहुप्रचारित दुर्लभ संयोग का आकर्षण। महीनों की तैयारी और हजारों करोड़ रुपये का खर्च। करोड़ों श्रद्धालुओं की जुटान। जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर मनुष्यों की इतनी बड़ी जुटान की मिसाल दुनिया में कहीं और नहीं। दुनिया के कई मुल्कों की जनसंख्या से भी ज्यादा लोगों का गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती नदी के संगम तट के आस-पास जुटान। छोटी सी चूक किसी बड़ी अनहोनी को न्योता दे सकती है। हुआ भी कुछ ऐसा। अमावस की काली रात को भगदड़ मची और कई जिंदगियां स्वाहा हो गईं। कई जख्मी हो गए। सरकारी आंकड़े में 30 मौत की पुष्टि लेकिन अब भी तमाम लोग अपनों को ढूंढ रहे हैं। मुर्दाघरों में रखीं बेजान शरीरों में तो कभी अस्पतालों के बाहर घायलों में। महाकुंभ के महाउत्सव में जुट रही महाभीड़ पर अपनी पीठ थपथपाती सरकार अब जाकर ‘सफलता’ के मदमस्त नशे से बाहर आई है। तंद्रा टूटी है। लेकिन हुजूर, जागते-जागते बड़ी देर कर दी। क्या जागने के लिए हादसे का इंतजार किया जा रहा था?

प्रयागराज महाकुंभ के अमृत स्नानों में मौनी अमावस्या का सबसे ज्यादा महत्व माना जाता है। भीड़ भी जुटी। 7 करोड़ से भी ज्यादा श्रद्धालुओं के जुटने का अनुमान था और श्रद्धालुओं का रेला अनुमान से भी कहीं ज्यादा पहुंच गया। इतनी बड़ी भीड़ को नियंत्रित करना अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती होती है। भगदड़ के बाद स्थितियों को और ज्यादा बिगड़ने से प्रशासन ने रोका, ये अच्छी बात है क्योंकि जहां जनसमंदर हो, वहां एक छोटी सी अफवाह भी बहुत ही बड़ी त्रासदी को जन्म दे सकती है, यहां तो त्रासदी घट भी चुकी थी। अब जाकर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सरकार और प्रशासन के स्तर पर तमाम कदम उठाए गए हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार ने भगदड़ की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं लेकिन कुछ सवाल जवाब मांग रहे हैं।

हादसे की असली वजह क्या थी, ये तो न्यायिक जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन सवाल ये है कि जहां करोड़ों लोग जुट रहे हों, वहां आम श्रद्धालुओं की असुविधा को बढ़ाकर वीआईपी स्नान जैसी व्यवस्था क्यों? ‘वीआईपी स्नान’ के नग्न प्रदर्शन की टीस महाराज प्रेमानंद गिरि के शब्दों में भी दिखी जब उन्होंने कहा कि प्रशासन का पूरा ध्यान वीआईपी पर था। आम श्रद्धालुओं को उनके हाल पर छोड़ दिया गया था। उनका आरोप है कि पूरा प्रशासन वीवीआईपी की जी-हुजूरी में लगा रहा, तुष्टीकरण में लगा रहा।

वीआईपी की भी आस्था होती है, इससे कहां कोई इनकार कर सकता है लेकिन आम लोगों की कीमत पर वीआईपी ट्रीटमेंट क्यों? अगर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए तो वीआईपी लोगों के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की गई कि उनके मूवमेंट की वजह से आम श्रद्धालुओं को दिक्कत न हो? आम श्रद्धालु15-15, 20-20 किलोमीटर पैदल चलकर स्नान करने पहुंचे और कथित वीआईपी गाड़ियों के रेले के साथ सीधे तट तक पहुंचे, ये तो आम श्रद्धालुओं में रोष, खींझ और असंतोष पैदा करने वाला ही होगा। भगदड़ से एक दिन-दो दिन पहले तक ऐसी खबरें आ रही थीं कि पीपे के तमाम पुलों को आम श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया गया ताकि कथित वीआईपी अपने वीआईपीपने का प्रदर्शन कर सकें।

वीआईपी के लिए हेलिपैड की भी तो व्यवस्था की जा सकती थी कि वे हेलिकॉप्टर से मेला क्षेत्र पहुंचते और आम श्रद्धालुओं को बिना परेशानी में डाले स्नान आदि करके वे लौट जाते। समस्या ये है कि अपने देश में थोक के भाव में तो वीआईपी हैं। महाकुंभ जैसे बड़े आयोजन के लिए तो वीआईपी लिस्ट की कायदे से कांट-छांट होनी ही चाहिए। लेकिन नहीं। थोक के भाव में वीआईपी पास बंट रहे हैं। वीआईपी होना और वीआईपी ट्रीटमेंट की डिमांड और कुछ नहीं, एक मानसिकता है। मानसिकता औरों पर रौब जमाने की। मानसिकता खुद को अलग दिखाने की। मानसिकता ये जताने की कि हम राजा हैं, आम श्रद्धालु प्रजा। प्रजा क्या, कीड़े-मकोड़े जो दर्जनों मील पैदल चलकर पहुंचेगी लेकिन साहब धड़धड़ाते गाड़ियों के साथ पहुंचेंगे। काफिले के साथ पहुंचेंगे। वही मानसिकता कि हम तो तुर्रम खां हैं। ये वैसे ही है जैसे सरकारी सुरक्षा के पाने की हसरत के पीछे सुरक्षा को खतरा से कहीं ज्यादा स्टेटस सिंबल की मानसिकता।

खैर, हादसे के बाद सरकार और मेला प्रशासन अब जगता हुआ दिख रहा है। सारे वीआईपी पास रद्द कर दिए गए हैं। पूरे महाकुंभ क्षेत्र में किसी भी तरह की गाड़ियों की एंट्री रोक दी गई है ताकि भीड़ का प्रबंधन सही से हो और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो। किसी भी स्पेशल पास के जरिए अब गाड़ियों को एंट्री नहीं मिलेगी। प्रयागराज से सटे जिलों से आने वाली गाड़ियों को जिले की सीमा पर रोका जा रहा है। 4 फरवरी तक शहर में किसी भी चार पहिया गाड़ी की एंट्री पर बैन लगा दिया गया है। सड़कों के किनारे से स्ट्रीट वेंडर्स को हटाने का निर्देश दिया गया है ताकि श्रद्धालु अबाध तरीके से आगे बढ़ते रहें। ये ऐहतियाती उपाय जरूरी हैं लेकिन सरकार और प्रशासन को ये ध्यान देना होगा कि

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