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मुफ्त की चुनावी रेवड़ियों से इकॉनमी हो सकती है बेहाल, ब्राजील जैसा हो सकता है भारत का हाल

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नई दिल्ली

हाल में संपन्न दिल्ली विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को अपनी ओर रिझाने के लिए एक से बढ़कर एक वादे किए और अब इन पर अमल करने की बारी है। मुफ्त की रेवड़ियां बांटना अब सिर्फ चुनावी वादा नहीं रह गया है, बल्कि चुनाव जीतने के लिए एक जरूरी दांव बन गया है। Aequitas Investments की एक रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक पार्टियां वोट पाने के लिए कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर मुफ्त की चीजें बांट रही हैं। इससे सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे राजनीतिक दलों के बीच होड़ बढ़ रही है, कल्याणकारी योजनाएं और मुफ्त की रेवड़ियां चुनावी वादों से आगे बढ़कर राजनीतिक शक्ति का नया पैमाना बन गई हैं। मतलब साफ है कि राजनीतिक दलों के बीच मुफ्त की रेवड़ी बांटकर वोट हासिल करने की होड़ मची हुई है।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 2024 के आम चुनावों ने देश की वित्तीय नीतियों में एक बड़ा बदलाव ला दिया है। विधानसभा चुनावों से यह और साफ हो गया है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए किस हद तक रेवड़ियां बांटने में लगे हैं। ऐसी योजनाएं भले ही लोगों को थोड़े समय के लिए फायदा पहुंचाएं लेकिन लंबे समय में राज्यों के लिए आर्थिक संकट पैदा कर सकती हैं। रिपोर्ट कहती है कि हमें ध्यान रखना होगा कि आज का फायदा कल मुसीबत न बन जाए।

मुफ्त की रेवड़ियां
कर्नाटक इसका एक बड़ा उदाहरण है। कांग्रेस की जीत के बाद वहां कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू हुईं। गृह लक्ष्मी योजना में महिलाओं को हर महीने 2,000 रुपये मिलते हैं। इसी तरह गृह ज्योति योजना में 200 यूनिट बिजली मुफ्त है। इन दोनों योजनाओं पर करीब 52,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह रकम राज्य के 2023-24 के वित्तीय घाटे का 78% है। इससे कर्नाटक की आर्थिक स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं। बीजेपी ने राज्य में सिर्फ 2,100 करोड़ रुपये यानी घाटे का सिर्फ 3% कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करने की योजना बनाई थी।

कर्नाटक अकेला नहीं है। दूसरे राज्य भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। महाराष्ट्र में लाडली बहना योजना शुरू की गई है। राज्य के हाइवेज पर टोल खत्म करने, किसानों का कर्ज माफ करने और मुफ्त स्वास्थ्य सेवा जैसी योजनाओं पर सालाना 44,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। उत्तर प्रदेश ने महिला पेंशन और वृद्ध कल्याण कार्यक्रमों के लिए 36,000 करोड़ रुपये रखे हैं। बिहार में नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 75% आरक्षण लागू किया गया है। दिल्ली में बिजली सब्सिडी बढ़ा दी गई है, जिससे 22 लाख घरों को मुफ्त बिजली मिल रही है। हाल ही में दिल्ली में हुए चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों ने 18 साल से ऊपर की सभी महिलाओं को 2100-2500 रुपये देने का वादा किया गया था। दिल्ली की महिलाओं को पहले से ही मुफ्त बस यात्रा मिल रही है।

ब्राजील जैसा हाल
इन मुफ्त की रेवड़ियों का बोझ अब दिखने लगा है। दिल्ली ने साल 2024-25 के लिए राष्ट्रीय लघु बचत कोष (NSSF) से 10,000 करोड़ रुपये का कर्ज मांगा है जबकि उसके अपने वित्त विभाग ने इसका विरोध किया था। पंजाब, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों को सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने में भी दिक्कत हो रही है। ब्राजील के ‘बोल्सा फैमिलिया’ कार्यक्रम से तुलना करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि 2003 में शुरू हुआ यह कार्यक्रम 36 लाख परिवारों को आर्थिक सहायता देने के लिए था। 2020 तक यह 1.41 करोड़ परिवारों तक पहुंच गया। इससे गरीबी तो कम हुई, लेकिन देश की आर्थिक मुश्किलें भी बढ़ गईं।

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