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‘बिना शादी बेशर्मी से साथ रह रहे…’, लिव-इन पार्टनर की याचिका पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

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नई दिल्ली,

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य के समान नागरिक संहिता के तहत लिव-इन रिलेशनशिप की अनिवार्य रजिस्ट्रेशन प्रोसेस को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा कि जब कपल्स बिना शादी के “बेशर्मी” से साथ रह रहे हैं, तो रजिस्ट्रेशन उनकी निजता का उल्लंघन कैसे कर रहा है?

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जी नरेंद्र और जस्टिस आलोक मेहरा की बेंच ने याचिका की सुनवाई करते हुए कहा, “आप समाज में रह रहे हैं, न कि जंगल की किसी दूरस्थ गुफा में. पड़ोसियों से लेकर समाज तक, आपकी रिश्तेदारी है और आप बिना विवाह के साथ रह रहे हैं. फिर लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन आपकी गोपनीयता का उल्लंघन कैसे कर सकता है?”

याचिकाकर्ता ने क्या दिया तर्क?
याचिका देने वालों ने अदालत में दलील दी कि अनिवार्य रजिस्ट्रेशन का प्रावधान उनके निजता पर आक्रमण है और अगर उन्होंने इसे पूरा नहीं किया तो उन्हें जेल या जुर्माना का सामना करना पड़ सकता है. उनका कहना है कि वे एक इंटर-फेथ जोड़ हैं, जिसके कारण उनके लिए समाज में रहना और अपने रिश्ते का रजिस्ट्रेशन कराना मुश्किल है.

भविष्य में कपल्स के लिए पैदा हो सकती है मुश्किल
याचिकाकर्ताओं के वकील का कहना था कि कई लिव-इन रिलेशनशिप सफल विवाह में परिवर्तित हुए हैं और यह प्रावधान जोड़ों के भविष्य और गोपनीयता में बाधा डालता है. लोकहित याचिका और अन्य याचिकाओं पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि UCC से असंतुष्ट लोग हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं.

याचिकर्ता के वकील अभिजय नेगी ने कहा कि हमने भारत में देखा है कि कुछ अंतरधार्मिक जोड़ों के साथ क्या हुआ है. अल्मोड़ा जिले में जगदीश नाम के एक युवक की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि वह एक अंतरधार्मिक जोड़े का हिस्सा था.

अब अप्रैल में होगी मामले की सुनवाई
कोर्ट अब इस मामले की सुनवाई 1 अप्रैल को अन्य समान याचिकाओं के साथ करेगा. कोर्ट के इस कदम ने राज्य में विवादास्पद UCC के इर्द-गिर्द चल रही सार्वजनिक चर्चा को और गरमा दिया है. यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाली सुनवाई में कौन से नए तर्क सामने आते हैं और इसका परिणाम क्या होता है.

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