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Wednesday, June 3, 2026
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बिहार चुनाव पलायनवाद के मुद्दे पर खेलने की तैयारी में कांग्रेस, सामाजिक न्याय का उठाएगी मुद्दा

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नई दिल्ली

देश के दो बड़े राज्यों बिहार और यूपी में अपनी जमीन बुरी तरह से खो चुकी कांग्रेस एक बार फिर यहां अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश में लगी है। बिहार में जहां इस साल के अंत में चुनाव होने हैं। कांग्रेस ने वहां इन चुनाव में दो अहम मुद्दों पर चुनावी दांव लगाने की योजना बनाई है। इनमें पलायनवाद और सामाजिक न्याय अहम हैं। राहुल गांधी पिछले कुछ अर्से में दो बार बिहार का दौरा कर चुके हैं। वहां वह सामाजिक न्याय की लगातार बात कर रहे हैं। फिर चाहे जातिगत जनगणना की बात हो या फिर दलित, आदिवासी, पिछड़ों, अति पिछड़ों या अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दे, पार्टी इन के मुद्दे उठाकर इन लोगों को उनके हक दिलाने की बात कर रही है।

बिहार चुनाव पर कांग्रेस का फोकस
कांग्रेस की योजना है कि अलग-अलग समुदायों के बीच जाकर उनसे लगातार संपर्क और संवाद कायम करना। राहुल गांधी के कार्यक्रमों के जरिए जहां दलितों की बात हुई तो वहीं रविवार को पार्टी पटना में ओबीसी का एक बड़ा सम्मेलन करने जा रही है। कांग्रेस इस कार्यक्रम के जरिए ओबीसी समुदाय तक अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है। जहां यादव समुदाय आरजेडी के साथ है तो वहीं कांग्रेस यादवों के अलावा पिछड़ों के जो दूसरे समुदाय है, जिनमें कोइरी, कुर्मी इन सबके बीच अपनी मौजूदगी चाहती है।

अल्पसंख्यकों को गोलबंद करने की कोशिश
कांग्रेस के एक अहम रणनीतिकार का मानना था कि बिहार सोशल जस्टिस का चैंपियन है। यहां सभी समुदाय राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक हैं। दूसरी ओर कांग्रेस अल्पसंख्यकों के बीच भी जाकर उन्हें गोलबंद करने की कोशिश में लगी है। पार्टी ने अपने प्रभारी सचिव शहनवाज आलम को पिछले दिनों राज्य के सीमांचल इलाके में भेजा था।

किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार जैसे इलाकों वाला सीमांचल में मुस्लिमों की खासी आबादी है। पार्टी इन लोगों के बीच जाकर कांग्रेस के साथ मोबलाइज कर रही है कि कैसे कांग्रेस ही संविधान की लड़ाई लड़ रही है। इस समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि कैसे एआईएमआईएम जैसे दल आखिरी मौके पर आकर सेक्युलर ताकतों के वोट काटते है, जिसका फायदा बीजेपी और उसके सहयोगी को होता है।

पलायनवाद को अहम मुद्दा बनाने की कोशिश
देश भर को सबसे ज्यादा प्रवासी श्रमिक देने वाले बिहार में इस बार कांग्रेस ने रोजगार के लिए हो रहे पलायन को ही चुनाव का सबसे अहम मुद्दा बनाने की तैयारी की है। इस बार चुनाव में जमीन पर पार्टी आंदोलन की तर्ज पर पलायन के मुद्दे को उठाएगी। लोगों के बीच बताएगी कि कैसे पिछले इतने दशकों से बिहार में रोजगार की हालत खराब होती गई और यहां के लोग दूसरे राज्यों में पलायन को मजबूर होते रहे।

कांग्रेस नेता ने किया रणनीति का खुलासा
कांग्रेस इस मुद्दे को एक राजनीतिक और नीतिगत मुद्दे के रूप में आगे ले जाने की योजना बना रही है। कांग्रेस के एक बड़े नेता का कहना था कि हम लोगों के बीच जाकर बताएंगे कि पलायन के पीछे कारण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि राजनीतिक और नीतिगत मुद्दा है, जिसे राजनीतिक इच्छाशक्ति और नीतियों के जरिए कम किया जा सकता है। कांग्रेस की योजना है कि वह लोगों को बताएगी कि कैसे यूपीए सरकार के समय में मनरेगा को जमीन पर बेहतर ढंग से लागू करने करने पर राज्य से पलायन रुका था।

उक्त नेता का कहना था कि तब पंजाब के बड़े बड़े किसान लग्जरी बस लेकर बिहार से खेतों में काम करने वाले श्रमिक लेने आते थे। उन्हें अच्छे पैसे व मोबाइल जैसी चीजों का लुभावन देकर जाने के लिए राजी किया जाता था। यही बात हमें लोगों को समझाना है। उनका कहना था कि आज बिहार में गांव के गांव ऐसे हैं, जहां सिर्फ बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग रह रहे हैं, जबकि घर के युवा कमाने के लिए पलायन के लिए विवश हैं।

छोटे-छोटे ग्रुप में मीटिंग का प्लान
पलायन के मुद्दे को नीतिगत करार देते हुए कांग्रेस लोगों को बता रही है कि कांग्रेस शासित राज्य या जहां कांग्रेस सत्ता में रही है या आती जाती है, वहां कभी बिहार की ओर या दूसरे राज्यों में पलायन देखा है। पार्टी की रणनीति है कि जल्द ही वह योजनाबद्ध रूप से जगह-जगह बूथ स्तर से लेकर पंचायतों शहरों, मंडलों और जिलों में इस मुद्दे पर छोटे-छोटे समूह में मीटिंग शुरू करने जा रही है। जहां वह इन तमाम मुद्दों को सामने रखेगी। साथ ही, वह कहेगी कि नीति बनाकर पलायन के रोका जा सकता है, बिहार में ही रोजगार के साधन मुहैया कराए जा सकते हैं।

कांग्रेस लोगों को यह भी समझाने की कोशिश करेगी कि क्यों बिहार के लोग दूसरे राज्यों में जाते हैं, लेकिन दूसरे राज्यों से लोग बिहार क्यों नहीं आते? जबकि संयुक्त बिहार के समय में जब टाटा जैसी तमाम बड़ी कंपनियां थी, रोजगार था तो तमिलनाडु, ओड़िशा, बंगाल, आंध्र प्रदेश सहित तमाम प्रदेशों से लोग यहां काम करने आते थे।

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