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शराब ने दिल्ली में केजरीवाल को निपटाया, बिहार में असर का हो रहा इंतजार! PK के वादे से कन्विन्स होगी पब्लिक?

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पटना

आम आदमी पार्टी दिल्ली विधानसभा का चुनाव हार गई। हार के कई कारणों में एक वजह शराब मानी जा रही है। दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में शराब नीति बनाई। इसका राजस्व के संदर्भ में असर तो यही दिखा कि सीएम रहते अरविंद केजरीवाल जेल गए। मनीष सिसोदिया इसी मामले में उनसे पहले जेल में जीवन जी रहे थे। शराब से सीख लेने के बजाय आप सरकार ने एक और नायाब कड़ी इसमें जोड़ दी। एक पर एक फ्री स्कीम के तहत सरकार ने आदतन पियक्कड़ों की बांछें खिला दीं तो नए पियक्कड़ों की जमात भी खड़ी कर दी।

दिखते रहे हैं शराबबंदी के दुष्परिणाम
बिहार में शराबबंदी है। इसके दुष्परिणाम भी दिखते रहे हैं। शराबबंदी का फैसला तो सर्वसम्मति से हुआ था, लेकिन बाद में इसके नतीजों को देख कर विरोध में आवाज भी उठती रही हैं। बिहार का प्रमुख विपक्षी दल आरजेडी ने शराबबंदी खत्म करने को लेकर सीधे कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन जहरीली शराब से होने वाली मौतों पर जरूर उसकी आपत्ति रही है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी शराबबंदी खत्म करने की बात नहीं करते, लेकिन थोड़ी-थोड़ी पीने की छूट की वे अक्सर वकालत करते रहे हैं।

PK ने शराबबंदी को मुद्दा बनाया
बिहार में पिछले साल गांधी जयंती के मौके पर वजूद में आई पार्टी ‘जन सुराज’ के संस्थापक प्रशांत किशोर उर्फ पीके (PK) ने शराबबंदी पर क्लीयर स्टैंड लिया है। वे तो यहां तक कहते हैं कि उनकी सरकार बनी तो घंटे भर में वे शराबबंदी कानून को खत्म कर देंगे। उनका दावा है कि बिहार में शराबबंदी फेल है। शराब की दुकानें सरकार ने भले बंद कर दी हैं, लेकिन शराब की बिक्री बंद नहीं हुई है। बल्कि शराब खरीदना पहले से अब अधिक आसान है। इसलिए अब शराब की होम डिलीवरी धंधेबाज करने लगे हैं। इस तरह सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है और धंधेबाज समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर रहे हैं। उनकी सरकार बनी तो शराबबंदी खत्म करेगी और उससे जो राजस्व आय होगी, उससे बिहार में शिक्षा का विकास करेंगे।

PK घंटे भर में खत्म करेंगे शराबबंदी?
प्रशांत किशोर की इस योजना से असहमति भी जताई जाती रही है। तर्क दिया जाता है कि शिक्षा जैसे पुनीत काम में शराब के पैसे का इस्तेमाल महात्मा गांधी के आदर्शों का अपमान है। इसके लिए सत्ताधारी एनडीए के नेता प्रशांत किशोर की आलोचना भी करते रहे हैं। पर, प्रशांत अपने निर्णय पर अडिग हैं। बिहार की यात्रा पर दूसरी बार निकले प्रशांत किशोर ने बेतिया में अपनी बात फिर दोहराई। नीतीश कुमार के वे मुखर आलोचक हैं। उनका अनुमान है कि नीतीश कुमार की पार्टी को इस बार विधानसभा चुनाव में 20 से अधिक सीटें नहीं मिलने वालीं। उनके इस अनुमान का आधार नीतीश सरकार के कामकाज के अलावा शराबबंदी की विफलता भी है।

2020 में घट गईं जेडीयू की सीटें
सवाल उठता है कि क्या सच में नीतीश कुमार के लिए शराबबंदी काल साबित होगी। इसमें पूरी तो नहीं, लेकिन आंशिक सच्चाई तो जरूर है। इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलें। 2016 में नीतीश सरकार ने पूर्ण शराबबंदी का फैसला लिया। उसके बाद 2020 का विधानसभा चुनाव हुआ। शराब सेवन या बनाने-बेचने के आरोप में चार साल के दौरान हजारों लोग जेल गए। सैकड़ों की जान गई। नीतीश ने मुआवजा देने से भी यह कह कर मना कर दिया कि जो पिएगा, वह मरेगा।

हालांकि बाद में वे मुआवजे के लिए तैयार हुए। पर, तब तक उनका नुकसान तो हो ही चुका था। 70 से 115 सीटें जीतते हुए आ रहा जेडीयू 2020 के विधानसभा चुनाव में 43 पर सिमट गया। यह सही है कि इसके दूसरे भी कारण रहे होंगे, लेकिन शराबबंदी का कुछ तो असर था ही। तब शराबबंदी को किसी दल ने मुद्दा नहीं बनाया था। अब प्रशांत किशोर के चुनावी मुद्दों में यह प्रमुख मुद्दा बन गया है।

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