बीजिंग/वॉशिंगटन
चीन ने पहले ही हवा, जमीन और पानी के अंदर से मार करने वाली पारंपरिक और न्यूक्लियर मिसाइलों को विकसित कर रखा है। लेकिन अब अमेरिका को डर है कि चीन के पास पृथ्वी की निचली कक्षा से मार करने वाली न्यूक्लियर मिसाइले हैं, जिनसे वो तबाही ला सकता है। अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने 13 मई को एक चेतावनी रिपोर्ट जारी है, जिसमें बताया गया है कि कैसे अगले 10 सालों में चीन अंतरिक्ष में परिक्रमा करने वाली परमाणु वारहेड वाली मिसाइलों को जमा कर सकता है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक DIA ने कहा है कि ये मिसाइलें इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलों (ICBM) की तुलना में काफी कम समय में अमेरिका पर हमला कर सकती हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी DIA ने इन खतरों का खुलासा किया है, जिसपर वाइट हाउस की तरफ से भी एक चार्ट जारी किया गया है। इसी को आधार मानकर डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया का सबसे एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम ‘गोल्डेन डोम मिसाइल डिफेंस शील्ड’ को डिजाइन करने के लिए कहा है।
DIA की तरफ से एडवांस मिसाइलों से उत्पन्न होने वाले खतरों का जो चार्ट तैयार किया गया है, उसमें “फ्रैक्शनल ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम” यानि FOBS का जिक्र किया गया है। अमेरिका का मानना है चीन और कुछ हद तक रूस इसे बना रहा है। ये अंतरिक्ष से लॉन्च की जाने वाली परमाणु मिसाइलें हैं, जिसे पलक झपकते ही किसी देश पर गिराया जा सकता है। FOBS बनाने के साथ ही चीन ऐसी क्षमता विकसित कर लेगा, जिससे वो किसी भी पल अमेरिका पर परमाणु हमला करने की क्षमता हासिल कर लेगा और जाहिर तौर पर भारत भी इस खतरे की जद में होगा।
फ्रैक्शनल ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम (FOBS) क्या होता है?
FOBS एक ऐसा सिस्टम है, जिसे सोवियत संघ ने सबसे पहले डिजाइन किया था। लेकिन चीन ने नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर इसे विनाशक बना दिया है।
इस सिस्टम में एक हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV) शामिल होता है, जो अत्यधिक स्पीड के साथ अपने लक्ष्य पर हमला करता है। ये स्पीड हमारी आपकी सोच से काफी ज्यादा होगी।
इसके अलावा स्पेस से लॉन्च होने की वजह से इसकी रेंज असीमित होगी और पृथ्वी के किसी भी हिस्से को निशाना बनाने की क्षमता इन मिसाइलों में होगी, लिहाजा पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में ये काफी ज्यादा खतरनाक बन जाती है।
सिर्फ न्यूक्लियर ही नहीं, बल्कि पारंपरिक मिसाइलों को भी इससे लॉन्च किया जा सकता है, जिसकी वजह से दुनिया के पास अभी ऐसा कोई डिफेंस सिस्टम नहीं है, जिससे इन मिसाइलों को रोका जा सके।
FOBS किसी भी दिशा से हमला कर सकता है, जिसकी वजह से दुनिया में अभी तक जितने भी एयर डिफेंस सिस्टम हैं, उनके लिए इन्हें ट्रैक करना अत्यंत मुश्किल हो जाएगा।
अगर किसी मिसाइल डिफेंस सिस्टम ने इस ट्रैक कर भी लिया तो उसके पास रिएक्शन टाइम नहीं होगा।
DIA की रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक दुनिया के किसी भी देश ने अभी तक FOBS को डेवलप नहीं किया है, लेकिन भविष्य के लिए ये बहुत बड़ा खतरनाक होगा। DIA ने अनुमान लगाया है कि चीन के पास 2035 तक ऐसी कम से कम 60 मिसाइलें हो सकती हैं, जबकि रूस के पास ऐसी 12 मिसाइलें हो सकती हैं।
सोवियत संघ ने सबसे पहले बनाई थी टेक्नोलॉजी
यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक FOBS टेक्नोलॉजी को सबसे पहले सोवियत संघ ने शीतयुद्ध के समय तैयार किया था, जब अमेरिका के साथ उसका तनाव चरम पर था। सोवियत संघ ने 1960 के दशक में R-36O मिसाइल जैसी प्रणालियों के साथ FOBS को डेवलप किया था। ये मिसाइलें अमेरिका की रडार सिस्टम को चकमा देने वाली थीं, जो मुख्य रूप से उत्तरी ध्रुव पर आने वाली मिसाइलों का पता लगाने के लिए डिजाइन की गईं थी। इसे 1968 से 1983 तक सोवियत संघ ने अमेरिका के खिलाफ तैनात कर रखा था। 1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि और 1979 की SALT II संधि के बाद ऐसी मिसाइलों को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू की गई और फिर चरणबद्ध तरीके से इन्हें खत्म कर दिया गया। लेकिन 2021 में ये खतरा फिर से लौट आया, जब चीन ने FPBS का फ्लाइट टेस्ट कर दुनिया में हड़कंप मचा दिया।
