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हूतियों के हाथ लगा कौन सा ब्रह्मास्त्र, जिससे दहशत में आई अमेरिकी एयरफोर्स, जानें F-35 और f-16 के लिए कैसे बन गए खतरा

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सना:

यमन के हूती विद्रोहियों ने दुनिया की सबसे शक्तिशाली वायु सेना कही जाने वाली अमेरिकी एयरफोर्स को भी डरा दिया है। हाल ही में यमन में अमेरिकी वायु सेना के हवाई हमलों के दौरान हूती विद्रोही अमेरिकी F-35 ज्वाइंट स्ट्राइक फाइटर और F-16 वाइपर को मार गिराने के बहुत करीब पहुंच गए थे। खास बात ये है अत्याधुनिक सिस्टम से लैस अमेरिकी एयरफोर्स के सामने हूतियों की वायु रक्षा क्षमताएं काफी हद तक अल्पविकसित है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हूतियों के पास ऐसा कौन सा ब्रह्मास्त्र हाथ लग गया है, जो अमेरिकी फाइटर के लिए खतरा बन गया है।

हूतियों के पास कौन सी मिसाइल
द वॉर जोन की रिपोर्ट बताती है कि हूतियों के पास इन्फ्रारेड गाइडेड R-73 और R-27 हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों का भंडार है। इन मिसाइलों को सतह से हवा में इस्तेमाल करने के लिए फिर से तैयार किया गया है। स्थानीय रूप से इन्हें थकीब-1 और थकीब-2 कहा जाता है। यमन के विद्रोही समूह के पास सतह से हवा में मार करने वाली सक्र-सीरीज इन्फ्रारेड-होमिंग मिसाइलें भी हैं, जिनमें घूमने की क्षमता है।

सक्र मिसाइलों की ऊंचे और तेज उड़ान वाले फाइटर जेट्स को निशाना बनाने की क्षमता संभवतः कुछ हद तक सीमित है, लेकिन थकीब-1 और थकीब-2 ने अतीत में लड़ाकू विमानों को खतरे में डालने की क्षमता का प्रदर्शन किया है। हूतियों ने अमेरिकी और दूसरे देशों के ड्रोन को जमीन से हवा में निशाना बनाने के बाद इन्फ्रारेड कैमरे से लिए गए उसके फुटेज जारी किए हैं। इससे पता चलता है कि समूह इन्फ्रारेड सेंसर का इस्तेमाल इन्फ्रारेड मिसाइल प्रकारों के अलावा भी कर रहे हैं, जिसमें रेडार-गाइडेड सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली शामिल हैं।

इन्फ्रारेड सेंसर से कैसे घातक हो रहे हूती
सक्रिय रेडार के उलट इन्फ्रारेड सेंसर निष्क्रिय प्रकृति के होते हैं। इसका मतलब यह है कि वे ऐसे संकेत नहीं देते हैं, जिनसे पायलटों को पता चल सके कि कोई खतरा मौजूद है। यह स्टील्थ और नॉन-स्टील्थ, दोनों विमानों के लिए समान रूप से चुनौतियां प्रस्तुत करता है। रेडार-गाइडेड सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम के साथ इन्फ्रारेड सेंसर को जोड़ने से उन्हें अपने एंगेजमेंट चक्र में बहुत देर तक रेडिएशन शुरू न करके छिपे रहने में मदद मिल सकती है। इससे निशाने पर लिए गए विमान के लिए प्रतिक्रिया करने के लिए बहुत कम समय होगा।

सीबीएस न्यूज ने सितम्बर 2025 की अपनी एक स्टोरी में वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट फऑर नियर ईस्ट पॉलिसी के सीनियर फेलो माइकल नाइट्स के हवाले से बताया था कि हूती और ईरानियों ने इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल का इस्तेमाल किया, क्योंकि यह पूरी तरह से निष्क्रिय प्रणाली है। उन चीजों का पता लगाना मुश्किल होता है, क्योंकि लॉन्च से पहले उनका कोई निशान नहीं होता है।

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