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मराठा दुर्गों को विश्व धरोहर का सम्मानः शिवाजी की गाथाओं का वैश्विक गौरव: डॉ. अभिजीत देशमुख

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भोपाल

मराठा दुर्गों को विश्व धरोहर का सम्मानः शिवाजी की गाथाओं का वैश्विक गौरव: डॉ. अभिजीत देशमुख,भारत के लिए गौरवशाली क्षण युनेस्को ने भारत के 12 ऐतिहासिक मराठा दुर्गों को मराठा मिलिटरी लैंडस्केप्स ऑफ इंडिया शीर्षक से विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है? यह फैसला पेरिस में हुई विश्व धरोहर समिति की 47वीं बैठक में लिया गया, जिसके बाद विश्व धरोहर सूची में भारत की कुल प्रविष्टियों 44 हो गई हैं? महाराष्ट्र में स्थित 11 दुर्गों और तमिलनाडु के 1 दुर्ग को मिली यह वैश्विक मान्यता हर भारतीय के लिए अत्यंत गर्व का विषय है। देशभर में उत्सव का माहौल है। इसे हमारी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत के सम्मान के रूप में देखा जा रहा है।

दुर्गों का रणनीतिक जाल 17वीं से 19वीं शताब्दी के दौरान निर्मित इन दुर्गों ने मराठा साम्राज्य की रक्षा एवं विस्तार में केन्द्रीय भूमिका निभाई। ये सभी किले मराठा साम्राज्य की सैन्य क्षमता और वास्तुकला कौशल के अद्भुत उदाहरण हैं ?। पश्चिमी घाट की ऊँची पहाडयिों से लेकर अरब सागर के टापुओं तक फैले इन दुर्गों की अवस्थिति दर्शाती है कि मराठा सेनानायकों को भौगोलिक स्थितियों की गहरी समझ थी और उन्होंने प्रकृति के अनुरूप अपनी दुर्ग-रचनाएँ विकसित की।

कुछ दुर्ग ऊँची पहाड़ी चीटियों पर अजेय गढ़ बनकर खड़े हैं, तो कुछ सघन वन और पतारों में प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर बने हैं। कई किले समुद्र तट के द्वीपों पर स्थित हैं, जो मराठाओं की सुदृद्द नौसैनिक दृष्टि को प्रदर्शित करते हैं? वास्तव में, ये बारह दुर्ग मिलकर एक अभूतपूर्व सैन्य परिदृश्य का निर्माण करते हैं, जो क्षेत्रानुसार किलेबंदी की परंपरा में मराठाओं के नवाचार और अनुकूलन क्षमता को उजागर करता है।

गौरवशाली मराठा इतिहास

मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने 17वीं शताब्दी में जिस स्वराज्य की नींव रखी, इन किलों ने उसी सपने को साकार करने में आधारभूमि का काम किया। शिवनेरी किला जहाँ शिवाजी की जन्मस्थली है, वहीं रायगढ़ उनके राज्याभिषेक की गवाह है। प्रतापगढ़ की दुर्गम पहाडों ने 1659 में अफजल खान पर शिवाजी की बिजय देखी, तो पन्हाला दुर्ग ने 1660 में बाजी प्रभु देशपांडे के अद्वितीय बलिदान को स्मरणीय बनाया। हर एक किला अपने भीतर वीरता और बलिदान की अमर गाथाएँ समेटे हुए है। मराठाओं ने

मुगल साम्राज्य सहित हर विदेशी आक्रांता का डटकर मुकाबला किया और कभी किसी अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। मराठा शासकों की सुशासन, सैन्य कुशलता, सांस्कृतिक गर्व और लोककल्याण की परंपरा ने भारत के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय लिखा इन किलों की मजबूत प्राचीर, उानत तोपखानों की व्यवस्थाएँ और अत्याधुनिक जल एवं अनाज भंडारण प्रणालियाँ उस युग की अभियांत्रिकी प्रतिभा का प्रमाण हैं, जिसने मराठा साम्राज्य को दशकों तक अपराजेय बनाए रखा।

यूनेस्को द्वारा इन दुर्गों को विश्व धरोहर घोषित किया जाना मराठा इतिहास की गौरवगाथा को वैश्विक मंच पर उजागर करता है। इस सूची में शामिल दुर्गों में महाराष्ट्र के साल्हेर किला, शिवनेरी किला, लोहगढ़ किला, खदिरी किला, रायगढ़ किला, राजगढ़ किला, प्रतापगढ़ किला, सुवर्णदुर्ग किल्ला, पन्हाला किला, विजयदुर्ग किला, सिंधुदुर्ग किला और तमिलनाडु का जिंजी फिला प्रमुख हैं।

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ये दुर्ग न केवल मराठा साम्राज्य की रणनीतिक प्रतिभा और स्थापत्य कौशल के प्रतीक हैं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता और प्रकृति के साथ सामंजस्य के जीवंत उदाहरण भी हैं। विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से अब इन किलों का संरक्षण और प्रसार और तेजी से होगा, जिससे दुनिया भर के लोग मराठा वीरता और इतिहास की इस धरोहर से रूबरू ही सकेंगे। सचमुच, यह जय भवानी, जय शिवाजी की गूंज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने जैसा क्षण ह एक ऐसा गौरवशाली अवसर जिस पर हर भारतीय गर्व महसूस कर रहा है।

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