भोपाल
राम शब्द संस्कृत के दो धातुओं, रम् और घम से बना है। रम् का अर्थ है रमना या निहित होना और घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान। इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, रमन्ते योगिन: अस्मिन सा रामं उच्यते अर्थात, योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे ही राम कहते हैं। राम को प्रकाश के रूप में भी माना जाता क्योंकि रा का अर्थ है आहा (कांति) और म का अर्थ है मैं, मेरा और मैं स्वयं। राम का अर्थ है मेरे हृदय में प्रकाश । राम-राम शब्द जब भी अभिवादन करते समय बोल जाता है तो हमेशा 2 बार बोला जाता है। इसके पीछे एक वैदिक दृष्टिकोण है कि पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है। वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है,क्योंकि हिंदी वर्णमाला में र 27वां अक्षर है। आ की मात्रा दूसरा अक्षर और म 25वां अक्षर, इसलिए सब मिलाकर जो योग बनता है वो है 27 + 2 + 25 = 54, अर्थात एक राम का योग 54 हुआ। और दो बार राम राम कहने से 108 हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है। जब भी हम कोई जाप करते हैं तो हमे 108 बार जाप करने के लिए कहा जाता है लेकिन सिर्फ राम-राम कह देने से ही पूरी माला का जाप हो जाता है।
सुभाष सक्सेना,ज्योतिषचार्य भोपाल
