भोपाल
भेल भोपाल यूनिट की स्थापना के लिए राज्य सरकार ने करीब 6000 एकड़ जमीन दी थी इसमें से 2000 एकड़ जमीन पर कारखाना और टाउनशिप का निर्माण किया गया। कुछ जमीन एम्स और अंतर्राज्यीय बस अड्डे के निर्माण के लिए भेल प्रशासन ने वापस लौटा दीए इसके बाद भी भेल प्रशासन के पास 2000 एकड़ से जमीन खाली पड़ी है। खास बात यह है कि डेढ़ दशक पहले भेल कारखाने में कर्मचारियों की संख्या 22 हजार हुआ करती थी जो आज घटकर महज 4000 से भी कम रह गई है उस पर भेल जैसी महारत्न कंपनी ने भर्ती पर रोक लगा दी। उस पर हर माह 15 से 30 कर्मचारी रिटायर हो रहे हैं।
साफ जाहिर है कि यहां कर्मचारियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है ऐेसे में भेल टाउनशिप की हालत भी बिगड़ती जा रही है। बाजार लगातार सूने होते जा रहे हैं। इसको लेकर प्रबंधन के पास ऐसी कोई योजना नहीं है जिससे की टाउनशिप फिर से आबाद हो सके। इसके पूर्व भी यहां एनटीपीसी और भेल कॉलेब्रेशन के तहत एक बड़ा उद्योग स्थापित होना था लेकिन केन्द्र सरकार की अनुमति न मिलने के कारण स्थापित नहीं हो सके और एक सोलर प्लांट को लगाने के लिए अनुमति मिल गई तो राज्य सरकार ने रोक लगा दी।
भेल कर्मचारियों की घटती संख्या का असर टाउनशिप के बाजारों में नजर आने लगा है। बाजारों से रौनक गायब है। व्यापारियों को दुकानों का किराया निकालने में परेशानी हो रही है। बरखेड़ा के नेहरू मार्केट आजाद हिंद मार्केट व गोविंदपुरा के भगत सिंह मार्केट में कुछ दुकानें गोदाम बन गई हैं। यहां रहवासी क्षेत्र भी मौजूद नहीं है। सिर्फ टाउनशिप के बरखेड़ा विजय मार्केट और पिपलानी गांधी मार्केट में रौनक दिखाई देती है। भेल में 15 मार्केट हैं जिनमें करीब 1420 दुकानें हैं। इनमें गांधी मार्केट विजय मार्केट बरखेड़ा मार्केट कस्तूरबा मार्केट कालीबाड़ी मार्केट सही स्थिति में हैं। ये बाजार मुख्य सड़क व रहवासी इलाकों में मौजूद हैं।
इनके अलावा अन्य जगहों पर दुकानें नहीं चल रही हैं। बाजार में मंदी की वजह से कुछ व्यापारी छोड़कर भी जा चुके हैं। दरअसल पिछले 15 से 20 साल पहले करीब 22 हजार नियमित कर्मचारी कार्यरत थे। उस समय बाजारों में खरीदारी के लिए भीड़ भी होती थी। इसके बाद से कर्मचारियों के रिटायरमेंट बढ़ते गए। फिलहाल भेल में करीब 4000 से भी कम नियमित कर्मचारी हैं। करीब इतने ही ठेका श्रमिक है। उधर भेल के व्यापारी मांग करते आ रहे हैं कि बाजारों में दो मंजिला दुकान निर्माण की अनुमति दी जाए। इससे बाजारों में स्टॉक रखने की क्षमता बढ़ेगी और कई वेरायटी का सामान रखा जा सकेगा। इस पर भी सहमति नहीं बन सकी है।
दूसरी और व्यापारियों का कहना है कि इस समय मॉल कल्चर हावी है। वहां लोगों को ज्यादा वेरायटी उपलब्ध होती है। ऐसे में आम लोग बाजारों की तरफ कम ही आते हैं। व्यापारी नई शॉप पॉलिसी से भी परेशान हैं। भेल ने नई पालिसी में शॉप का किराया काफी बढ़ा दिया है। इसे लेकर भी विरोध है। व्यापारियों के मुताबिक बाजारों में सुविधाएं बढ़ाई जाना चाहिए इससे ग्राहक भी बढ़ेंगे। भेल के बाजार मॉल कल्चर से पिछड़ रहे हैं।
इनका कहना है.
भेल टाउनशिप के ज्यादातर मार्केटों की दयनीय स्थिति है। इस पर प्रबंधन बजाय सुविधा देने के लाइसेंस फीस बढ़ा रहा है। समय रहते प्रबंधन को व्यापारियों की मदद के लिए आगे आना चाहिए।
विजय राज कोशल,
भेल संयुक्त व्यापारी संघ
