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हजारों वर्षों से अखंड भारत में रहने वाले सभी लोग एक है : भागवत

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भोपाल।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज का स्वाभाविक गुण और हजारों वर्षों से चली आ रही परंपरा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि विविधताओं के बावजूद भारत की मूल पहचान एकता है और अखंड भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक ही है।
डॉ. भागवत भोपाल में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कानून समाज को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन समाज को जोड़कर रखने और आगे बढ़ाने का कार्य सद्भावना ही करती है। विविधता के बावजूद एकता को स्वीकार करना ही भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति है।

बाहरी रूप से हम अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के स्तर पर हम सभी एक हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू कोई संज्ञा नहीं, बल्कि एक जीवन दृष्टि है। यह मत, पूजा पद्धति या जीवनशैली के आधार पर भेदभाव नहीं करता। समाज में भ्रम फैलाकर जनजातीय और अन्य वर्गों को यह कहकर तोड़ने का प्रयास किया गया कि वे अलग हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे भी उसी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। डॉ. भागवत ने कहा कि सद्भाव केवल संकट के समय ही नहीं, बल्कि हर समय बनाए रखना आवश्यक है।

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एक-दूसरे से मिलना, संवाद करना और एक-दूसरे के कार्यों को समझना सद्भाव की पहली शर्त है। समाज के सक्षम वर्ग को कमजोर वर्गों की सहायता करनी चाहिए, यही सामाजिक समरसता का मूल मंत्र है। इस अवसर पर कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने संघ की तुलना भगवान शिव से करते हुए कहा कि संघ और शिव के भाव में अद्भुत समानता है। जैसे भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए विष पिया, वैसे ही संघ भी प्रतिदिन आरोपों, आलोचनाओं और विरोध का विष पीकर संयम, सेवा और राष्ट्रहित में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि संघ समाज के अलग-अलग वर्गों को जोड़ने का कार्य कर रहा है, लेकिन यह आत्मचिंतन भी आवश्यक है कि हमने राष्ट्र और समाज के लिए क्या योगदान दिया। जन्म किसी भी जाति में हो, लेकिन पहचान अंततः हिंदू, सनातनी और भारतीय के रूप में ही होती है।

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