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शिवराज सिंह चौहान को ‘इग्नोर’ करना बीजेपी को भारी न पड़े, कर्नाटक में की थी ऐसी गलती!

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भोपाल

एमपी में शिवराज सिंह चौहान 18 सालों से अधिक वक्त से सीएम हैं। प्रदेश में आज भी वह बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा है। हाल ही में घटित कुछ घटनाओं से संकेत मिले हैं कि बीजेपी शिवराज सिंह चौहान को किनारे लगाने में लगी है। बीजेपी की दूसरी सूची से यह संकेत मिलने लगे हैं। विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने अभी तक 79 प्रत्याशियों की सूची जारी की है। दूसरी सूची में उनके समकक्षों के नाम है। इससे साफ है कि तीन चुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर लड़ चुकी बीजेपी इस बार कुछ अलग रणनीति अपना रही है।

बीजेपी भले ही प्रदेश में डबल इंजन सरकार की बातें कर रही हो, लेकिन पिछले कुछ दिनों से सीएम शिवराज को पार्टी ने अलग-थलग कर दिया है। कार्यकर्ता महाकुंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधे घंटे से अधिक समय के संबोधन में एक बार भी सीएम शिवराज सिंह चौहान का नाम नहीं लिया। इतना ही नहीं, मोदी ने सीएम शिवराज की एक भी फ्लैगशिप योजनाओं जैसे लाड़ली बहना योजना का जिक्र भी नहीं किया।

ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या बीजेपी मध्य प्रदेश का चुनाव कर्नाटक की तर्ज पर लड़ने जा रही है? विश्लेषकों का कहना है कि मध्य प्रदेश में चुनाव के ऐन पहले लीडरशिप की कमी दिख रही है। गुटबाजी का खतरा सिर पर अलग मंडरा रहा है। वहीं, कांग्रेस लगातार 50% कमीशन का दाग बीजेपी पर लगा रही है। आपको बता दें कि कर्नाटक में भी भाजपा सरकार पर 40% कमीशन के आरोप कांग्रेस ने लगाए थे।

क्या थी कर्नाटक की रणनीति
पिछले कुछ महीने पहले कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए थे। यहां पर बीजेपी सत्ता में थी और विपक्षी दल कांग्रेस सीएम बसवराज बोम्मई पर कई आरोप मढ़ रहा था। चुनाव से ऐन पहले बीजेपी ने सीएम बोम्मई को अलग-थलग कर दिया था। अब यही रणनीति मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान पर भी अप्लाई होते दिख रही है।

बोम्मई की तरह कर्नाटक में बीजेपी बीएस येदियुरप्पा को भी साइड कर दिया था। कथित तौर पर इसकी वजह से उनके समर्थकों ने भी मुंह मोड़ लिया था। इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है। कर्नाटक में भी बीजेपी सामूहिक और पीएम मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही थी।

कहीं महंगा न पड़ जाए
कर्नाटक में मुख्यमंत्री को नजरअंदाज करके पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चेहरे पर लड़ा गया था। सीएम बोम्मई एक ओर विपक्षी दलों के आरोपों का प्रहार झेल रहे थे, वहीं अपनी भी पार्टी बीजेपी ने उन्हें अलग-थलग कर दिया था। परिणाम आने के बाद बीजेपी यहां अपनी सत्ता गंवा चुकी थी।

सीएम का चेहरा नहीं होगा
कर्नाटक में बीजेपी ने सीएम बोम्मई को सीएम पद का चेहरा नहीं बताया था। पार्टी ने सीएम का फेस भी तय नहीं किया था। वर्तमान में यही हाल मध्य प्रदेश में भी है। प्रधानमंत्री के भाषण में सीएम और उनकी योजनाओं का एक भी बार जिक्र न होना, इस बात का इशारा कर रहा है कि सीएम बिना फेस ही यह चुनाव लड़ा जाएगा।

एंटी इंकबेंसी की स्थिति नहीं
वहीं, एमपी की राजनीति को करीब से समझने वाले लोग कहते हैं कि प्रदेश में एंटी इंकबेंसी जैसी कोई स्थिति नहीं है। 2018 के विधानसभा चुनाव को शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर लड़ा गया था। इस चुनाव में बीजेपी की हार मामूली अंतर से हुई थी। नवंबर 2020 में उपचुनाव में हुए उसमें बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा। ऐसे में एंटी इंकबेंसी जैसी स्थिति नहीं है। आज भी मध्यप्रदेश में बीजेपी के सबसे लोकप्रिय चेहरा शिवराज सिंह चौहान ही हैं। बीजेपी में सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता हैं। उन्हें इस तरीके से अलग करना बीजेपी की सेहत के लिए ठीक नहीं है।

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