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MP: कभी था साधुओं का सिद्धपुर, फिर अंग्रेजों की इस शर्त के बाद पड़ा ‘सीहोर’ नाम

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सीहोर,

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के करीबी जिले सीहोर का इतिहास भी अहम है. यह पुरातत्व और आज़ादी के आंदोलन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण रहा है. ब्रिटिश शासन के दौरान यहां अंग्रेजों छावनी रही, जहां पॉलिटिकल एजेंट बैठते थे. यह कालान्तर में सिद्धपुर और सिद्धपुर से कैसे सीहोर बना? इसे लेकर सीहोर के दो वरिष्ठ इतिहासकार ओम दीप राठौर और रघुरावर दयाल गोहिया ने आज तक से विशेष बातचीत की.

सीवन नदी में सिद्धपुर लिखा हुआ शिला लेख निकला
इतिहासकारों ने बताया कि भोपाल नवाब की रियासत के दौरान निजामते मग़रिब के नाम से यह ऐसा जिला था कि जिसमें भोपाल तहसील हुजूर के नाम से शामिल था. वरिष्ठ इतिहासकार ओम दीप राठौर ने आजतक को बताया कि भोपाल स्टेट गजेटियर, में इसका नाम सीहोर ही लिखा हुआ है, यहां से फर्स्ट वर्ल्ड वार (1918) के दौरान ” वार न्यूज़ ” के नाम से एक पाक्षिक अख़बार भी प्रकाशित हुआ था, जिसमें भी सीहोर लिखा हुआ है. हालांकि कस्बा स्थित राम मंदिर में एक पत्थर का बीजक लगा हुआ है जिसमें सिद्धपुर भी अंकित है. इसके अलावा शिवना या शहर की सीवन नदी से भी एक शिला लेख मिला था जिस पर सिद्धपुर लिखा हुआ है.

भोपाल रियासत को मान्यता देने के लिए अंग्रेजों ने रखी थी शर्त
साल 1818 में भोपाल रियासत और अंग्रेज सरकार के बीच रायसेन में एक संधि हुई थी. तब अंग्रेज़ों ने शर्त रखी थी कि अगर उन्हें अपनी छावनी बनाने के लिए जगह दी जाए तो भोपाल रियासत को मान्यता दे देंगे. इसके चलते यहां भोपाल नवाब ने अंग्रेजों को छावनी बनाने के लिए जगह दी. आज जिस बिल्डिंग में कलेक्टर निवास है वहां कभी अंग्रजों का पॉलिटिकल एजेंट रहा करता था.

अंग्रेजों ने दिए थे कोड वर्ड
रघुवर दयाल गोहिया ने बताया कि ब्रिटिश सरकार ने अपनी सुविधा के लिए जहां उनके पॉलिटिकल एजेंट रहते थे और छावनियां (केंट) थीं. उन जगहों को C-1, C-2, C-3 जैसे कोड वर्ड दिए थे. सीहोर की केंट या छावनी C-4 थी तो बोलचाल में इसे सीफोर, कहा जाता था.

सिद्धियां प्राप्त करने आते थे साधु-संत, ऐसा पड़ा था सिद्धपुर नाम
वरिष्ठ इतिहासकार रघुवर दयाल गोहिया ने बताया कि सिद्धपुर नाम इसलिए भी पढ़ा की यहां सीवन नदी किनारे प्राचीन मंदिर है, कई मठ मंदिर गुफाएं भी है, 300 से 400 साल पहले साधु-संत, तपस्वी यहां तपस्या किया करते थे, सिध्दियां प्राप्त करते थे, साधु संत यहां सिद्ध हो गए, इसलिए इस तपों भूमि को सिद्धपुर के नाम से जाना जाने लगा.

जंगलों में थे अत्यधिक शेर तो नाम हुआ सीहोर
उन्होंने बताया कि इसके साथ ही कई सौ वर्ष पहले सीहोर के आसपास घना वन क्षेत्र हुआ करता था. इस कारण उसमें वन्य जीव बहुतायत में थे, इनमें शेर, सिंह, चीते, सियार आदि भी अत्यधिक थे. इस कारण इस स्थान को शेर, सेर, सियर, सिओर और फिर बाद में सीहोर हो गया. सीहोर का नाम शेर या लायन के एंग्लो-इंडियन विचलन से अंग्रेजों द्वारा उच्चारण किया गया है.

राजा-महाराजाओं का था शासन
बताया जाता है की यहां पर राजा महाराजा गोंड आदिवासी और पेशवाओं का राज रहा है. पेशवा प्रमुख, रानी कमलावती और भोपाल राजवंश के नवाबों के प्रशिक्षण में आया.

1824 की क्रांति: अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए थे कुंवर चैन सिंह
जिला जनसंपर्क विभाग से जारी प्रेस नोट और इतिहासकारों के मुताबिक देश में जब अंग्रेजी कुशासन का दौर चल रहा था तब उन्हें सीधे-सीधे चुनौती देने एवं ललकारने का साहस मालवा में सीहोर की धरती पर कुंवर चैनसिंह ने दिखाया था. 24 जुलाई 1824 को नरसिंहगढ़ रियासत के राजकुमार कुंवर चैन सिंह एवं उनके साथी हिम्मत खां और बहादुर खां सहित 43 सैनिकों के साथ अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे.

देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहली सशस्त्र क्रांति का पहला शहीद मंगल पांडे को माना जाता है. मगर कुंवर चैन सिंह की शहादत मंगल पांडे के शहीद होने की घटना से भी करीब 33 वर्ष पहले की है. सीहोर के इंदौर नाका स्तिथ दशहरे वाले बाग में अमर शहीद कुंवर चेन सिंह समाधी स्थल और छतरी बनी हुई है, जो उनकी शहादत का प्रतीक है. वहीं समीप ही हिम्मत खां एवं बहादुर खां के शहीद स्थल मौजूद है. अमर शहीद कुंवर चैन सिंह की शहादत स्थल पर कुछ वर्षो से 24 जुलाई को गार्ड ऑफ ऑनर जिला प्रशासन के द्वारा दिया जाने लगा है.

 

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